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कर्णप्रयाग केस: चार निहंगों को जमानत, सवाल- कानून का पालन या सरकार पर दबाव?

June 27, 2026
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कर्णप्रयाग केस: चार निहंगों को जमानत, सवाल- कानून का पालन या सरकार पर दबाव?
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कर्णप्रयाग में तलवार से जानलेवा हमले के आरोपी चार निहंगों को जिला एवं सत्र न्यायालय से जमानत मिल गई है। जिला एवं सत्र न्यायाधीश विंध्याचल सिंह ने 50-50 हजार के दो जमानती पर रिहाई के आदेश दिए। कोर्ट के इस फैसले के बाद एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या यह जमानत कानून की सामान्य प्रक्रिया है या फिर सरकार किसी दबाव में आई?

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कर्णप्रयाग में कुछ दिन पहले निहंगों और स्थानीय लोगों के बीच विवाद हिंसक झड़प में बदल गया था। आरोप है कि इस दौरान निहंगों ने तलवार से जानलेवा हमला किया। घटना के बाद क्षेत्र में तनाव फैल गया और पुलिस ने सतविंदर सिंह, अजय सिंह, जसप्रीत सिंह और मनप्रीत सिंह को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था।

कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद जमानत दे दी। कानूनी जानकारों का कहना है कि जमानत मिलना आरोपी का अधिकार है। भारतीय कानून में जब तक दोष साबित न हो, तब तक हर आरोपी निर्दोष माना जाता है। गंभीर धाराओं में भी अगर चार्जशीट दाखिल हो चुकी हो और ट्रायल लंबा खिंचने की संभावना हो तो कोर्ट जमानत दे सकती है।

वहीं दूसरी तरफ स्थानीय लोगों का एक वर्ग इस फैसले से नाराज है। लोगों का कहना है कि तलवार जैसे हथियार से खुलेआम हमले के मामले में इतनी जल्दी जमानत मिलना गलत संदेश देता है।

हाल ही में श्रीनगर, नगरासू और देहरादून में बाहरी लोगों से जुड़ी घटनाओं के बाद पहाड़ में गुस्सा पहले से है। ऐसे में लोगों को लग रहा है कि सरकार वोट बैंक या किसी दबाव के चलते सख्ती नहीं दिखा पा रही।

सरकार और प्रशासन का कहना है कि कोर्ट का फैसला स्वतंत्र है। जमानत देना या न देना पूरी तरह न्यायालय का अधिकार क्षेत्र है। सरकार इसमें दखल नहीं दे सकती। अभियोजन पक्ष की ओर से जिला शासकीय अधिवक्ता प्रकाश भंडारी ने पैरवी की थी। यानी सरकार ने अपना पक्ष रखा, लेकिन कोर्ट ने जमानत देना उचित समझा।

निहंगों से जुड़े मामलों में पहले भी पंजाब और दूसरे राज्यों में धार्मिक भावनाओं का हवाला देकर तनाव की स्थिति बन चुकी है। ऐसे में सरकारें अक्सर फूंक-फूंक कर कदम रखती हैं। मगर इसे सीधे तौर पर सरकार का डर कहना सही नहीं होगा।

चारों आरोपियों की रिहाई जमानती औपचारिकता पूरी होने के बाद होगी, लेकिन केस खत्म नहीं हुआ है। ट्रायल चलेगा और आरोप साबित होने पर सजा भी हो सकती है। जमानत का मतलब बरी होना नहीं होता।

इस पूरे मामले ने एक बार फिर कानून, जनभावना और सरकार की भूमिका पर बहस छेड़ दी है। अब देखना होगा कि आने वाले दिनों में ट्रायल किस दिशा में जाता है और सरकार पहाड़ में कानून व्यवस्था को लेकर कितनी सख्ती दिखाती है।

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