देहरादून। सरकार ने एक बार फिर बेरोजगार युवाओं को “सपने” बेचने का काम किया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी “मुख्यमंत्री युवा भविष्य निर्माण योजना” के नाम से मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग देने की घोषणा कर रहे हैं। लेकिन सवाल ये है कि 3 साल से भर्ती के इंतजार में बैठे लाखों युवाओं को कोचिंग का क्या फायदा, जब पेपर लीक, भर्ती रद्द और नियुक्ति में देरी का खेल बंद ही नहीं हो रहा?
बेरोजगारों का दर्द
कोचिंग किस काम की जब वैकेंसी ही नहीं
पिछले 2 साल में उत्तराखंड में हजारों पद खाली हैं। शिक्षक, पटवारी, पुलिस, स्वास्थ्य विभाग में भर्ती अटकी पड़ी हैं। युवा कह रहे हैं “पहले पेपर कराओ, फिर कोचिंग का ढोल बजाना”।
ऑनलाइन कोचिंग = पहाड़ों का मजाक
सरकार कह रही है “घर बैठे कोचिंग”। लेकिन उत्तराखंड के 40% गांवों में आज भी ठीक से नेटवर्क नहीं आता। लाइट कटती है। ऐसे में ऑनलाइन कोचिंग किसके लिए है? सिर्फ शहर के चुनिंदा लोगों के लिए?
पुरानी योजनाओं का क्या हुआ?
समाज कल्याण विभाग पहले भी “मेधावी छात्रों” को कोचिंग देता था। उसका रिजल्ट क्या रहा? कितने बच्चे अफसर बने? इसका कोई हिसाब नहीं। अब उसी को नए नाम से परोस दिया गया।
सरकार पर सवाल
विपक्ष और बेरोजगार संघों का आरोप है कि सरकार नौकरी देने की बजाय “कोचिंग के नाम पर खानापूर्ति” कर रही है।
– भर्ती कैलेंडर कहां है?
– पेपर लीक के दोषियों पर कार्रवाई कब होगी?
– संविदा कर्मचारियों को स्थाई कब किया जाएगा?
एक बेरोजगार अभ्यर्थी ने कहा: _”हमें UPSC का क्लास नहीं चाहिए। हमें समूह ग, समूह घ की भर्ती चाहिए। 5 साल से फॉर्म भरे हैं, एग्जाम की डेट नहीं आई।”_
सरकार की ये योजना “दिखावे” के सिवा कुछ नहीं। जब तक पारदर्शी भर्ती, समय पर परीक्षा और भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगेगी, तब तक मुफ्त कोचिंग सिर्फ सरकारी विज्ञापन बनकर रह जाएगी।







