उत्तराखंड। कभी सोने के भाव बिकने वाली हिमालयन वियाग्रा यानी कीड़ा-जड़ी अब कौड़ियों के दाम बिकने को मजबूर है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी मांग घटने से दाम औंधे मुंह गिर गए हैं। जो कीड़ा-जड़ी तीन साल पहले 16 से 17 लाख रुपये प्रति किलो बिकती थी, आज उसके लिए 3 से 4 लाख रुपये देने वाला भी नहीं मिल रहा।
इसका सीधा असर पिथौरागढ़, चमोली के सीमांत क्षेत्रों के उन 2000 परिवारों पर पड़ा है, जिनकी साल भर की रोजी-रोटी इसी पर टिकी है। मुनस्यारी, धारचूला और मल्ला जोहार के ग्रामीण हर साल मई-जून में बर्फ पिघलते ही अपनी जान जोखिम में डालकर इसे खोजने निकलते हैं।
जिले में हर साल 70 से 180 किलो तक कीड़ा-जड़ी निकलती है। रालम, राजरंभा, पंचाचूली, नागनीधुरा, छिपलाकेदार और बलाती जैसे 12 हजार फीट से ऊंचे बुग्यालों में ग्रामीण माइनस 15 डिग्री में हफ्तों तक टेंट लगाकर रहते हैं और मिट्टी खोदकर इसे निकालते हैं।
दरअसल इसे निकालना भी एक कला है। यह आधा कीड़ा और आधा जड़ी होता है। जमीन के ऊपर सिर्फ दो इंच का भूरे-पीले रंग का तना दिखता है, जबकि नीचे कीड़ा वाला हिस्सा मिट्टी में धंसा होता है। जरा सी चूक हुई और यह टूट जाता है, जिससे इसकी कीमत खत्म हो जाती है।
ग्रामीणों का कहना है कि पहले चीन और अन्य देशों से व्यापारी मुंहमांगी कीमत देकर ले जाते थे, क्योंकि इसका उपयोग यौन शक्ति और इम्यूनिटी बढ़ाने वाली दवाओं में होता है। लेकिन अब खरीदार ही नहीं आ रहे। महंगी और जोखिम भरी इस जड़ी को निकालने के बाद भी उन्हें लागत तक नहीं मिल पा रही।











