नॉर्वे की युवा पत्रकार Helle Lyng Svendsen इन दिनों पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बनी हुई हैं। वजह है प्रधानमंत्री Narendra Modi से पूछा गया उनका वह सवाल, जिसमें उन्होंने प्रेस की आजादी को लेकर सीधा प्रश्न किया था।
ओस्लो स्थित अखबार Dagsavisen की पत्रकार हेल्ले लिंग स्वेंडसन ने 18 मई को नॉर्वे दौरे के दौरान प्रधानमंत्री मोदी से पूछा था, “दुनिया की सबसे आजाद प्रेस के सामने आप सवाल क्यों नहीं लेते?”
यह सवाल उस समय पूछा गया जब मोदी नॉर्वे के प्रधानमंत्री के साथ संयुक्त प्रेस बयान के बाद वहां से निकल रहे थे। मोदी बिना जवाब दिए आगे बढ़ गए, लेकिन इस एक सवाल ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी।
“मोदी ने सवाल जरूर सुना होगा”
स्वेंडसन ने ब्रिटिश अखबार The Telegraph को दिए इंटरव्यू में कहा कि उन्हें पूरा भरोसा है कि प्रधानमंत्री मोदी ने उनका सवाल सुना था। उन्होंने कहा, “मुझे यकीन है कि उन्होंने मेरी आवाज सुनी… जब तक कि उन्हें कोई सुनने से जुड़ी स्वास्थ्य समस्या न हो, जिसके बारे में मुझे जानकारी नहीं है।”
उन्होंने बताया कि वह प्रधानमंत्री से बहुत दूर नहीं थीं। “मैं दूसरी पंक्ति में बैठी थी। कमरा छोटा था और वह मेरे बेहद करीब से गुजर रहे थे।”
“भारत आना चाहती हूं, लेकिन पता नहीं स्वागत होगा या नहीं”
स्वेंडसन ने कहा कि वह भारत आना चाहती हैं, लेकिन मौजूदा माहौल देखकर उन्हें संदेह है कि भारत उनका स्वागत करेगा या नहीं। उन्होंने हंसते हुए कहा, “मैं भारत आकर रिपोर्टिंग करना चाहूंगी। अगर वह संभव नहीं हुआ तो संस्कृति, इतिहास और लोगों को करीब से जानना चाहूंगी।”
सोशल मीडिया अकाउंट सस्पेंड होने का दावा
पत्रकार ने दावा किया कि सवाल पूछने के कुछ घंटों बाद उनके इंस्टाग्राम और फेसबुक अकाउंट अचानक सस्पेंड कर दिए गए। उन्होंने कहा, “मोदी के नॉर्वे छोड़ने के बाद अचानक मेरा इंस्टाग्राम बंद हो गया। फिर फेसबुक अकाउंट भी सस्पेंड कर दिया गया। मैंने ऐसा पहले कभी अनुभव नहीं किया।”
हालांकि बाद में उनके अकाउंट कुछ समय के लिए बहाल हुए और फिर दोबारा बंद भी हुए। उन्होंने कहा कि उन्हें सही वजह नहीं पता, लेकिन संभव है कि बड़ी संख्या में लोगों द्वारा शिकायत किए जाने के कारण ऐसा हुआ हो।
भारतीय मीडिया और सोशल मीडिया पर निशाना
स्वेंडसन ने कहा कि भारत में उन्हें टीवी डिबेट और सोशल मीडिया पर लगातार निशाना बनाया गया। उन पर “शोबाजी”, “एजेंडा चलाने” और “विदेशी एजेंट” तक होने के आरोप लगाए गए।
उन्होंने कहा, “मैंने इस मुद्दे को अपने बारे में नहीं बनाया। भारतीय मीडिया ने इसे मेरे बारे में बना दिया। असली खबर यह होनी चाहिए थी कि नॉर्वे में मोदी से प्रेस की स्वतंत्रता पर सवाल पूछा गया।”
मोदी से क्या पूछना चाहती थीं?
स्वेंडसन ने कहा कि अगर प्रधानमंत्री रुकते तो वह भारत में मानवाधिकार और प्रेस की स्वतंत्रता पर सवाल पूछतीं।
वह जानना चाहती थीं कि:
भारत में मानवाधिकार सुधार के लिए सरकार क्या कदम उठाएगी?
क्या सरकार आलोचनाओं को स्वीकार करेगी?
क्या मोदी भारत में स्वतंत्र पत्रकारों के सवाल लेना शुरू करेंगे?
उन्होंने यह भी कहा कि मोदी ने पिछले 12 वर्षों में कोई खुली और बिना तय स्क्रिप्ट वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की है।
विदेश मंत्रालय के अधिकारी से भी पूछा सवाल
स्वेंडसन ने बाद में विदेश मंत्रालय के सचिव Sibi George से भी भारत के मानवाधिकार रिकॉर्ड पर सवाल पूछा। इसके जवाब में सिबी जॉर्ज ने भारत की सभ्यता, शून्य की खोज और शतरंज जैसे विषयों पर लंबा जवाब दिया। यह वीडियो भी भारत में काफी वायरल हुआ और राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया।
राहुल गांधी से हुई संक्षिप्त बातचीत
स्वेंडसन ने बताया कि सोशल मीडिया पर उनकी नेता प्रतिपक्ष Rahul Gandhi से भी संक्षिप्त बातचीत हुई थी। उन्होंने कहा कि इसके बाद कुछ लोगों ने उन्हें “कांग्रेस समर्थक”, “जॉर्ज सोरोस एजेंट” और “विदेशी जासूस” तक कहना शुरू कर दिया। हालांकि उन्होंने साफ कहा कि वह किसी राजनीतिक दल के पक्ष में नहीं हैं। “मैं राहुल गांधी से भी मुश्किल सवाल पूछती,” उन्होंने कहा।
“भारत के पत्रकार असली मुश्किल काम कर रहे”
स्वेंडसन ने भारतीय पत्रकारों की सराहना भी की। उन्होंने कहा कि भारत में पत्रकार कठिन परिस्थितियों में काम कर रहे हैं।
उन्होंने कहा, “मैं दुनिया के एक सुरक्षित और विशेषाधिकार प्राप्त हिस्से से अपना काम कर रही थी। असली मुश्किल काम भारत के पत्रकार कर रहे हैं।”
ट्रंप का भी किया जिक्र
जब उनसे पूछा गया कि कौन सा विश्व नेता मुश्किल सवालों का सबसे ज्यादा सामना करता है, तो उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump का नाम लिया। उन्होंने कहा, “ट्रंप लगभग हर दिन सवाल लेते हैं। मैंने भी उनसे सवाल पूछे हैं, हालांकि वहां माहौल काफी गर्म होता है।”
नॉर्वे की राजनीति का उदाहरण
स्वेंडसन ने कहा कि नॉर्वे में नेता बड़े राजनीतिक संकट के दौरान भी मीडिया के सवालों से नहीं बचते। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री Erna Solberg का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने एक बड़े विवाद के दौरान एक ही दिन में 14 इंटरव्यू दिए थे।
स्वेंडसन के मुताबिक, “यह उसी देश में संभव है जहां लोकतंत्र और प्रेस की स्वतंत्रता को प्राथमिकता दी जाती है।”




