नैनीताल। उत्तराखंड में अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों के तबादलों में सुप्रीम कोर्ट के आदेश और कैडर नियमों की 12 साल से लगातार अनदेखी का मामला सामने आया है। इस संबंध में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने सोमवार को केंद्र और राज्य सरकार को दो सप्ताह के भीतर प्रति-शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने मामले को तीन सप्ताह बाद सूचीबद्ध करने को कहा है।
यह याचिका नागरिक संगठन ‘नागरिक मंच’ से जुड़े बागेश्वर निवासी सामाजिक कार्यकर्ता पंकज पांडे ने दायर की है। याचिका में केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) और मुख्य सचिव को सिविल सेवा बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में, साथ ही कार्मिक, गृह और वन विभाग के प्रमुख सचिवों को प्रतिवादी बनाया गया है। पांडे इससे पहले सरयू नदी में प्रदूषण को लेकर भी PIL दायर कर चुके हैं।
क्या है आरोप?
याचिका में आरोप है कि राज्य सरकार 12 वर्षों से अधिक समय से अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों के तबादले और तैनाती में नियमों का उल्लंघन कर रही है। साथ ही अधिकारियों की चल-अचल संपत्ति के विवरण की जांच के लिए अखिल भारतीय सेवा (आचरण नियमावली) 1968 के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल न कर, संपत्ति विवरण को महज खानापूरी बना दिया गया है।
मामले की जड़ में सुप्रीम कोर्ट का 31 अक्टूबर 2013 का टी.एस.आर. सुब्रमण्यम बनाम भारत संघ फैसला है, जिसमें तबादलों पर परामर्श के लिए सिविल सेवा बोर्ड (CSB) गठित करने और न्यूनतम कार्यकाल तय करने का आदेश दिया गया था। इसके बाद DoPT ने 28 जनवरी 2014 को नियमों में संशोधन कर कहा था कि बोर्ड की सिफारिश के बिना कोई तबादला नहीं होगा, हर पद का न्यूनतम कार्यकाल दो साल होगा, बोर्ड की सिफारिश के खिलाफ फैसले पर लिखित कारण देना होगा और समय-पूर्व तबादलों की तिमाही रिपोर्ट केंद्र को भेजनी होगी।
RTI दस्तावेजों से खुलासे का दावा
याचिका में RTI से मिले दस्तावेजों का हवाला देते हुए कहा गया है कि उत्तराखंड ने 2014 में IAS और IFS के लिए बोर्ड बना तो दिया, लेकिन 2014 से अब तक IAS के सैकड़ों तबादलों में से एक-दो को छोड़कर सभी बिना बोर्ड के ही कर दिए गए। IPS के लगभग सभी तबादले “उच्च स्तर” से मौखिक निर्देश पर किए गए और आदेश के बाद मुख्यमंत्री से कार्योत्तर अनुमोदन लिया गया, जिसमें दो साल के न्यूनतम कार्यकाल के नियम का उल्लंघन हुआ।
IPS के लिए अगस्त 2018 में बोर्ड गठन का प्रस्ताव आया, पर टाल दिया गया। गृह विभाग ने प्रकाश सिंह अवमानना मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2014 के आदेश का हवाला देकर तैनातियां पुलिस स्थापना बोर्ड से कराईं। IFS के प्रस्ताव बोर्ड को भेजे गए, लेकिन आरोप है कि उनमें कारण दर्ज नहीं किए गए और पहले से तय सूची पर केवल हस्ताक्षर की औपचारिकता पूरी की गई।
याचिका में यह भी कहा गया है कि केंद्र को एक भी तिमाही रिपोर्ट नहीं भेजी गई और DoPT के 16 दिसंबर 2025 के पत्र का, जिसमें बोर्डों की कार्यप्रणाली का ब्योरा मांगा गया था, राज्य ने आज तक जवाब नहीं दिया।
कई अधिकारियों के मामलों का जिक्र
याचिका में कई अधिकारियों से जुड़े मामलों का भी उल्लेख है।
1. देहरादून के SSP का मामला: वर्तमान SSP प्रमेन्द्र सिंह डोबाल के खिलाफ मई 2013 में नैनीताल में बलात्कार का मामला दर्ज होने और मामला हाईकोर्ट में लंबित होने के बावजूद सीधी भर्ती के IPS अधिकारियों को दरकिनार कर उन्हें राजधानी की कानून-व्यवस्था की कमान सौंपी गई। इस मामले में 2013 में पीड़िता ने इच्छामृत्यु की मांग की थी।
2. UKSSSC पेपर लीक कनेक्शन: 1983 बैच के IAS एस. राजू के खिलाफ 2013 में राज्य जल निगम के MD पद की चयन प्रक्रिया में अनियमितता पर सुप्रीम कोर्ट की प्रतिकूल टिप्पणी के बावजूद उन्हें रिटायरमेंट के बाद अधीनस्थ सेवा चयन आयोग का अध्यक्ष बना दिया गया, जहां से अगस्त 2022 में पेपर लीक मामले में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।
3. तबादले को बताया उत्पीड़न: जुलाई 2020 में उधम सिंह नगर के तत्कालीन SSP बरिंदरजीत सिंह (IPS 2008) ने अपने समय-पूर्व तबादले को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए इसे दुर्भावनापूर्ण और निशाना बनाने वाला बताया था।
4. IPR न भरने पर भी प्रमोशन: IFS अधिकारी रंजन कुमार मिश्रा ने लगभग दस साल तक अचल संपत्ति विवरण (IPR) दाखिल नहीं किया, फिर भी नियमों को दरकिनार कर उन्हें वेतन मैट्रिक्स के सर्वोच्च लेवल-17 तक पदोन्नत कर हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स (HoFF) बना दिया गया।
5. मुख्य सचिव पर सवाल: CSB के पदेन अध्यक्ष मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन के प्रमुख सचिव वन रहते हुए कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में वित्तीय अनियमितताओं के मामले में NGT द्वारा गठित समिति की रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया है, जिसमें उन स्वीकृतियों को जारी करने वाले सभी अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया गया था।
याचिका में यह भी कहा गया है कि याचिकाकर्ता के गृह जिले बागेश्वर में पिछले चार साल में पांच-पांच पुलिस अधीक्षक बदले गए, जबकि नियमों के मुताबिक इस अवधि में अधिकतम दो ही होने चाहिए। इससे विकास और कानून-व्यवस्था प्रभावित होती है।
संपत्ति जांच पर सवाल
याचिका में कहा गया है कि आचरण नियमावली 1968 के नियम 16 के तहत संपत्ति विवरण दाखिल करना लिपिकीय औपचारिकता बन गया है, जबकि नियम 16(5) के तहत राज्य और केंद्र को किसी भी समय किसी भी अधिकारी की संपत्ति का पूरा ब्योरा तलब कर जांच का अधिकार है। आरोप है कि राज्य गठन के बाद से केवल एक IAS अधिकारी राम विलास यादव के खिलाफ ही आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज हुआ है।
याचिकाकर्ता की मांग
याचिकाकर्ता ने मांग की है कि बोर्ड की सिफारिश के बिना कोई तबादला न किया जाए, बोर्ड के खिलाफ लिए गए फैसलों पर लिखित कारण दर्ज हो, 28 जनवरी 2014 से अब तक के सभी समय-पूर्व तबादलों की समेकित रिपोर्ट पेश की जाए, नियम तोड़ने वाले CSB सदस्यों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई हो और संपत्ति विवरणों की वार्षिक जांच के लिए नियम 16(5) के तहत संस्थागत तंत्र बनाया जाए।










