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बड़ी खबर : सवालों में सीबीआई, तीस हजारी कोर्ट ने संयुक्त निदेशक वी.के. पाण्डेय को ठहराया दोषी

April 21, 2026
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नई दिल्ली। आज एक ऐतिहासिक फैसले में, रामनीश, जो वर्तमान में संयुक्त निदेशक, CBI के पद पर कार्यरत हैं (जो वर्ष 2000 में प्रासंगिक समय पर उप अधीक्षक पुलिस, SIU-8, CBI के पद पर तैनात थे), और वी.के. पांडे, सेवानिवृत्त सहायक पुलिस आयुक्त, दिल्ली (प्रासंगिक समय पर इंस्पेक्टर, SIU-9, CBI), को धारा 323/427/448/34 IPC के तहत स्वेच्छा से चोट पहुँचाना, शरारत, आपराधिक अतिचार और सामान्य इरादे से किए गए कार्य — का दोषी ठहराया गया है। यह फैसला तीस हजारी न्यायालय, नई दिल्ली के पश्चिम जिले के JMFC-02, शशांक नंदन भट्ट की अदालत द्वारा सुनाया गया।

 

शिकायतकर्ता अशोक कुमार अग्रवाल हैं, जो 1985 बैच के IRS अधिकारी हैं, जो प्रासंगिक समय पर उप निदेशक प्रवर्तन, दिल्ली क्षेत्र के पद पर कार्यरत थे, और जिन्हें अंततः उनके विरुद्ध दोनों CBI मामलों में उन्मुक्त (डिस्चार्ज) कर दिया गया था। इस अपराधिक मामले में अशोक अग्रवाल को न्याय मिलने में लगभग 25 वर्ष का समय लगा।

न्यायालय के प्रमुख निष्कर्ष — एक नजर में

तीस हजारी न्यायालय, नई दिल्ली के पश्चिम जिले के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी-02, शशांक नंदन भट्ट की अदालत ने आज दो वरिष्ठ CBI अधिकारियों के विरुद्ध एक ऐतिहासिक दोषसिद्धि का फैसला सुनाया। न्यायालय के प्रमुख निष्कर्ष निम्नलिखित हैं:

गिरफ्तारी दुर्भावनापूर्ण थी: 19.10.2000 की संपूर्ण तलाशी और गिरफ्तारी की कार्यवाही दुर्भावनापूर्ण तरीके से, केवल CAT के दिनांक 28.09.2000 के आदेश को निष्प्रभावी करने के एकमात्र उद्देश्य से की गई थी, जिसमें शिकायतकर्ता के समझे गए निलंबन की चार सप्ताह के भीतर समीक्षा का निर्देश दिया गया था।
आधिकारिक शक्ति का दुरुपयोग: अभियुक्त व्यक्तियों ने कानून द्वारा उन्हें प्रदत्त शक्तियों का घोर उल्लंघन करते हुए कार्य किया। उनके कार्य ‘आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन’ की परिधि में नहीं आते और इसलिए वे धारा 197 Cr.P.C. या दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 140 के तहत संरक्षण के हकदार नहीं हैं।
जबरन प्रवेश प्रमाणित: अभियुक्तों ने बिना किसी औचित्य के शिकायतकर्ता के घर का मुख्य स्लाइडिंग दरवाजा तोड़ा, जो शरारत और आपराधिक अतिचार की श्रेणी में आता है

यह तथ्य दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष दाखिल स्वयं अभियुक्तों की तलाशी सूची से भी पुष्टि हुई।
हिरासत में हिंसा स्थापित: शिकायतकर्ता को उसके शयनकक्ष से घसीटा गया, सीढ़ियों पर हाथापाई की गई, और उसके दाहिने अग्रभाग (forearm) पर चोट आई — यह चश्मदीद गवाहों की गवाही, शिकायतकर्ता के MLC और महत्त्वपूर्ण रूप से, दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष अभियुक्त वी.के. पांडे के अपने प्रति-शपथपत्र में स्वीकारोक्ति से स्थापित किया गया।
षड्यंत्र स्थापित: CAT के निर्देशानुसार 18.10.2000 तक आयकर सतर्कता निदेशालय को अपेक्षित उत्तर भेजने के बजाय, CBI कार्यालय ने 18.10.2000 की शाम को एक गुप्त बैठक आयोजित की और अगली सुबह शिकायतकर्ता के यहाँ छापा मारकर उसे गिरफ्तार करने का निर्णय लिया इस क्रम को न्यायालय ने एक जानबूझकर की गई षड्यंत्रकारी कार्यवाही माना।
शिकायतकर्ता को अंततः उन्मुक्त किया गया: शिकायतकर्ता को अंततः दोनों CBI मामलों में उन्मुक्त (डिस्चार्ज) कर दिया गया जिनमें उसकी जाँच की जा रही थी, जिससे उसकी स्थिति और अधिक न्यायसंगत सिद्ध हुई।

शिकायतकर्ता, प्रभावशाली व्यक्तियों से जुड़े संवेदनशील FERA मामलों की जाँच करते हुए, अपने वरिष्ठ अधिकारियों से लगातार दबाव का सामना कर रहे थे। उन्होंने 1998-1999 के बीच राजस्व सचिव को सात अभ्यावेदन अपनी जाँच में हस्तक्षेप के संबंध में दिए। कथित प्रतिशोध में, एक अभिषेक वर्मा — जिसकी जाँच शिकायतकर्ता कर रहे थे — ने CBI अधिकारियों की मिलीभगत से उनके विरुद्ध शिकायत दर्ज कराई, जिससे FIR संख्या RCS-19/1999 E0006 दर्ज हुई। शिकायतकर्ता को इस मामले में 20 से अधिक बार तलब किया गया और उन्होंने जाँच में पूरा सहयोग किया।

जब CAT ने 28.09.2000 को उनके समझे गए निलंबन की समीक्षा का आदेश दिया, तो शिकायतकर्ता ने अभियुक्त रामनीश को निलंबन समीक्षा में देरी करने और उन्हें और फँसाने के लिए वित्त मंत्रालय के अधिकारियों से बात करते हुए सुना। आयकर सतर्कता निदेशालय ने SP, CBI को एक पत्र भेजा जिसमें 18.10.2000 तक उत्तर माँगा गया था। उत्तर देने के बजाय, CBI ने उसी शाम एक गुप्त बैठक की और अगली सुबह शिकायतकर्ता को गिरफ्तार करने का निर्णय लिया।

घटनाक्रम

लगभग सुबह 5:00 बजे, CBI अधिकारियों की एक टीम शिकायतकर्ता के आवास पर पहुँची। सुरक्षा गार्ड को, जब उसने परिचय-पत्र माँगा, तो पीटा गया। टीम ने सीमा दीवार फाँदी, मुख्य स्लाइडिंग दरवाजा तोड़ा, परिवार के सदस्यों को एक कमरे में बंद कर दिया, और शिकायतकर्ता को उसके अंतःवस्त्र (undergarments) में शयनकक्ष से बाहर घसीटा। उसे सीढ़ियों पर हाथापाई करके धकेला गया, जिससे उसके दाहिने हाथ में चोटें आईं। उसे पीरागढ़ी चौक के पास एक अज्ञात स्थान पर ले जाया गया और सुबह 8:45 बजे DDU अस्पताल में पेश किया गया। उसे CBI अदालत के समक्ष यह मुद्दा उठाने पर परिवार के सदस्यों को गिरफ्तार करने की धमकी दी गई।

महत्त्वपूर्ण कानूनी निष्कर्ष

धारा 197 Cr.P.C. सुरक्षा पर: दिल्ली उच्च न्यायालय पहले ही 2016 में यह निर्धारित कर चुका था कि अभियुक्त इस संरक्षण के हकदार नहीं हैं, जिसे मार्च 2023 में सर्वोच्च न्यायालय ने भी बरकरार रखा। ट्रायल कोर्ट ने स्वतंत्र रूप से इस निष्कर्ष की पुष्टि करते हुए कहा कि शक्ति के दुरुपयोग और दुर्भावनापूर्ण इरादे से किए गए कार्यों को आधिकारिक कर्तव्य का निर्वहन नहीं कहा जा सकता।

बचाव पक्ष के संस्करण पर: न्यायालय ने बचाव पक्ष के संस्करण को विरोधाभासों से भरा हुआ मानते हुए अस्वीकार कर दिया — सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि अभियुक्तों की अपनी तलाशी सूची (दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष दाखिल) ने पुष्टि की कि मुख्य दरवाजा तोड़ा गया था, जबकि मुकदमे में बचाव पक्ष के गवाहों ने दावा किया कि केवल एक चिटखनी (latch) उखड़ी थी। इसके अलावा, यदि अभियुक्तों ने शिकायतकर्ता को फाइलें हटाते देखकर प्रवेश किया, तो उन्हें वे फाइलें जब्त करनी चाहिए थीं — लेकिन कोई फाइल बरामद ही नहीं हुई।

MLC पर: न्यायालय ने यह तर्क अस्वीकार कर दिया कि MLC सिद्ध नहीं हुई, यह कहते हुए कि इसे स्वयं अभियुक्त वी.के. पांडे ने धारा 294 Cr.P.C. के तहत स्वीकार किया था और यह दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष उनके अपने शपथपत्र का हिस्सा था, जिसमें स्वयं उच्च न्यायालय ने शिकायतकर्ता के शरीर पर मामूली चोटों का उल्लेख किया था।

विलंब पर: शिकायत दाखिल करने में एक वर्ष की देरी को इस तथ्य से संतोषजनक ढंग से स्पष्ट किया गया कि अभियुक्त शक्तिशाली CBI अधिकारी थे जिन्होंने शिकायतकर्ता और उसके परिवार को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी थी।

न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में निष्कर्ष निकाला:

“अभियुक्त व्यक्तियों द्वारा 19.10.2000 को की गई संपूर्ण तलाशी और गिरफ्तारी की कार्यवाही कानून द्वारा उन्हें प्रदत्त शक्तियों का घोर उल्लंघन करते हुए और CAT द्वारा दिनांक 28.09.2000 को पारित आदेश को विफल करने तथा निष्प्रभावी करने के एकमात्र उद्देश्य से की गई थी। अभियुक्त व्यक्तियों के कार्य जानबूझकर किए गए ऐसे प्रयास थे जिनका उद्देश्य शिकायतकर्ता को CAT द्वारा पारित आदेश के फल से वंचित करना था… जो ‘उचित संदेह से परे’ के निर्धारित मानदंड के अनुसार शिकायतकर्ता के मामले को सुदृढ़ रूप से स्थापित करते हैं।”

तदनुसार, रामनीश, CBI के कार्यरत संयुक्त निदेशक, और वी.के. पांडे, CBI इंस्पेक्टर, धारा 323/427/448/34 IPC के तहत दोषी ठहराए जाते हैं। यह फैसला 18 अप्रैल, 2026 को खुली अदालत में हस्ताक्षरित और उद्घोषित किया गया।

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