भराड़ीसैंण में विधानसभा सत्र के पहले ही दिन सबसे बड़ा धमाका खानपुर से निर्दलीय विधायक उमेश कुमार ने कर दिया। आमतौर पर विधायक सरकार के खिलाफ नाराजगी में इस्तीफा देते हैं, लेकिन उमेश कुमार ने उल्टी लकीर खींच दी। उन्होंने बुधवार को अपनी विधायकी से इस्तीफा देने का ऐलान करते हुए निशाने पर सत्तापक्ष भाजपा को नहीं, बल्कि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को ले लिया।
उमेश कुमार ने गैरसैंण में मीडिया से बात करते हुए कहा कि उनका मन खिन्न हो चुका है। वह दुखी और व्यथित हैं। उन्होंने कहा कि वह पिछले साढ़े चार साल से विपक्ष की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देख रहे थे कि विपक्ष भ्रष्टाचार, महंगाई और जनता के मुद्दों पर उनका साथ देगा, लेकिन विपक्ष ने हर बार दूरी बना ली। उमेश कुमार ने हरिद्वार में किसानों की फसलों की बर्बादी का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि हरिद्वार में किसानों की फसलें पूरी तरह बर्बाद हो गईं, किसान खून के आंसू रो रहे हैं, लेकिन उस मुद्दे पर विपक्ष का एक भी विधायक उनके साथ खड़ा नहीं हुआ। ऐसे में सिर्फ नाम के लिए विधायक बने रहने का कोई मतलब नहीं है।
सबसे दिलचस्प बात यह रही कि उन्होंने अपने अगले सियासी कदम को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों के दरवाजे बंद कर दिए। उन्होंने साफ कहा कि वह न तो भाजपा में जाएंगे और न ही कांग्रेस में। अपने ही अंदाज में उन्होंने कहा कि वह भाजपा में जाकर त्रिवेंद्र सिंह रावत जिंदाबाद और कांग्रेस में जाकर हरीश रावत जिंदाबाद के नारे नहीं लगा सकते, जो लोग कल तक उनके दरवाजे पर आकर बैठते थे।
अब सवाल उठ रहा है कि आखिर विपक्ष को आड़े हाथों लेकर इस्तीफे का यह दांव किस नए समीकरण की तरफ इशारा कर रहा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह सिर्फ इस्तीफा नहीं, बल्कि एक नई सियासी चाल है। उमेश कुमार ने खुद संकेत दिया है कि वह उत्तराखंड में 8 से 10 सीटों पर अपनी टीम उतारकर भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के खिलाफ एक नया मोर्चा बनाना चाहते हैं। उनका कहना है कि उत्तराखंड ने भाजपा और कांग्रेस दोनों को देख लिया है, दोनों को मौका दे दिया है, लेकिन कुछ बदला नहीं। इसलिए अब वह तीसरे विकल्प की कोशिश करेंगे।
जाहिर है, सत्र के बीच में एक निर्दलीय विधायक का विपक्ष पर हमला बोलकर इस्तीफा देना, कांग्रेस के लिए भी असहज स्थिति पैदा कर रहा है, जो पहले से ही सरकार को 14 मुद्दों पर घेरने की तैयारी में थी। अब देखना होगा कि उमेश कुमार बुधवार को सच में इस्तीफा देते हैं या यह दबाव की राजनीति है, लेकिन इतना तय है कि खानपुर से चला यह सियासी तीर देहरादून तक गूंजेगा।











