देहरादून। जौनसार-बावर में जौनसारी जनजाति प्रमाणपत्र देने की व्यवस्था पर अब बड़े संवैधानिक सवाल उठने लगे हैं। मामला सिर्फ कागज जारी करने का नहीं रहा, बल्कि यह तय करने का है कि ST सर्टिफिकेट का असली आधार क्या होना चाहिए। क्या जौनसार में रहने भर से कोई व्यक्ति जनजाति का हो जाता है या फिर उसे अधिसूचित जौनसारी समुदाय का हिस्सा होना जरूरी है।
संविधान का अनुच्छेद 342 साफ कहता है कि अनुसूचित जनजाति की अधिसूचना किसी समुदाय या जनजाति के आधार पर होती है, किसी पूरे इलाके के नाम पर नहीं। अनुच्छेद 366(25) भी इसी को दोहराता है। ऐसे में केवल निवास और समुदाय की सदस्यता में बड़ा कानूनी अंतर है।
यदि इतिहास देखें तो 24 जून 1967 को जारी राष्ट्रपति आदेश में उत्तर प्रदेश के लिए भोटिया, बुक्सा, जौनसारी, राजी और थारू को ST के रूप में अधिसूचित किया गया था। उत्तराखंड अलग होने के बाद यही सूची यहां भी लागू रही। यहां गौर करने वाली बात यह है कि आदेश में जौनसारी समुदाय का नाम है, पूरे जौनसार-बावर क्षेत्र के हर निवासी का नहीं।
इसी मुद्दे पर उत्तराखंड हाईकोर्ट भी सरकार से जवाब मांग चुका है। 2 मई 2025 को इटिका पांडे केस में कोर्ट ने पूछा था कि क्या सिर्फ जौनसार में रहने के आधार पर ST प्रमाणपत्र दिया जा सकता है। सरकार ने तब कोर्ट में कहा था कि जौनसारी एक अधिसूचित समुदाय है, केवल वहां रहने से कोई उसका सदस्य नहीं बन जाता। कोर्ट ने इसके बाद प्रमाणपत्र देने के मानदंड और अब तक निवास के आधार पर जारी हुए प्रमाणपत्रों का ब्यौरा मांगा था। हालांकि यह मामला अभी अंतिम फैसले तक नहीं पहुंचा है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जौनसारी होने का प्रमाण क्या है। क्या इसके लिए पुराने खतौनी-खसरा देखे जा रहे हैं, क्या पिता-दादा के ST प्रमाणपत्र अनिवार्य हैं, क्या वंशावली और स्कूल रिकॉर्ड की जांच होती है और क्या तहसील की रिपोर्ट जरूरी है। सबसे अहम बात यह कि सरकार ने इसके लिए लिखित नियम क्या बनाए हैं, यह आज तक सार्वजनिक रूप से साफ नहीं है।
इसी के साथ सामान्य जाति के लोगों को प्रमाणपत्र मिलने की चर्चा भी जोरों पर है। लेकिन किसी को सिर्फ उसकी जाति के नाम पर अपात्र कहना भी सही नहीं होगा और केवल जौनसार में रह रहा है इसलिए पात्र मान लेना भी संवैधानिक रूप से गलत हो सकता है। फैसला कानून और सबूतों के आधार पर होना चाहिए।
नाम की वर्तनी भी एक विवाद रही है। जौनसारी, जन्नसारी और जौनासारी जैसी अलग-अलग वर्तनी को लेकर सितंबर 2025 में हाईकोर्ट में याचिका भी आई थी, जिसमें कहा गया था कि इससे नौकरियों में दिक्कत हो रही है। लेकिन कोर्ट का निर्देश और राष्ट्रपति अधिसूचना में संशोधन होना दो अलग बातें हैं।
सुप्रीम कोर्ट का माधुरी पाटिल वाला फैसला भी यहां अहम हो जाता है, जिसमें कोर्ट ने फर्जी जाति प्रमाणपत्रों पर सख्त जांच की बात कही थी, ताकि असली हकदारों का हक न मारा जाए।
अब जरूरत है कि प्रशासन आंकड़ों के साथ सामने आए। कितने प्रमाणपत्र जारी हुए, कितने रद्द हुए, कितनों की जांच हुई और किस शासनादेश के तहत यह पूरी प्रक्रिया चल रही है। जब तक सरकार दस्तावेजों के साथ स्पष्ट जवाब नहीं देती, जौनसारी प्रमाणपत्र व्यवस्था पर सवाल बने रहेंगे।













