देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी से मीडिया जगत को शर्मसार करने वाली खबर सामने आई है। आरोप है कि अमर उजाला की देहरादून यूनिट में रात की शिफ्ट में अखबार पहुंचाने का काम संभालने वाले सात कर्मचारियों को एक झटके में नौकरी से बाहर कर दिया गया।
बताया जा रहा है कि इन कर्मचारियों को न तो पहले कोई नोटिस दिया गया, न हटाने की कोई वजह बताई गई और न ही उनका बकाया पैसा दिया गया। इनमें एक कर्मचारी ऐसा भी है, जो पिछले 14 साल से नाइट सुपरवाइजर के तौर पर रात-रात भर जागकर संस्थान की सेवा कर रहा था।
ओवरटाइम मांगा तो नौकरी गई
कर्मचारियों का सबसे बड़ा आरोप यही है। उनका कहना है कि उनसे रोजाना 10 से 11 घंटे तक काम लिया जाता था। जब उन्होंने तय समय से ज्यादा काम के बदले अतिरिक्त भुगतान की मांग उठाई, तो प्रबंधन ने उनकी बात सुनने के बजाय उन्हें काम पर आने से ही मना कर दिया।
कर्मचारियों के अनुसार, यूनिट के जीएम हंसराज शर्मा ने साफ कह दिया कि कल से काम पर आने की जरूरत नहीं है।
पीड़ित कर्मचारियों का यह भी कहना है कि काम पर रखते वक्त उन्हें कभी कोई जॉइनिंग लेटर नहीं दिया गया। और जब हटाया गया, तब भी कोई लिखित नोटिस नहीं दिया गया। बातचीत तक नहीं की गई। सीधे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
ये सभी कर्मचारी इंप्रेशन प्रिंटिंग पैकेजिंग लिमिटेड के तहत काम कर रहे थे।
सबसे चौंकाने वाला खुलासा वेतन को लेकर हुआ है। शिकायत के मुताबिक, रात के डिस्पैच में काम करने वाले इन कर्मचारियों को महीने में महज 9,000 से 9,500 रुपये दिए जा रहे थे।
कर्मचारियों का सवाल है कि क्या उत्तराखंड में सरकार की तय न्यूनतम मजदूरी से भी कम वेतन पर किसी से रात भर काम करवाया जा सकता है?
नौकरी जाने के बाद अब इन सातों परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
यह मामला पूरी तरह कर्मचारियों की शिकायत पर आधारित है। जीएम हंसराज शर्मा और संबंधित कंपनी का पक्ष अभी सामने नहीं आया है। उनका पक्ष मिलने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
सवाल अभी भी वही है – जो अखबार दूसरों के हक की लड़ाई लड़ने का दावा करता है, क्या उसी के दफ्तर में मजदूरों के हक कुचले जा रहे हैं? क्या 14 साल की वफादारी की कीमत सिर्फ एक आदेश पर नौकरी से निकाल देना है?
श्रम विभाग को अब इस मामले में खुद संज्ञान लेकर जांच करनी चाहिए कि आखिर इन कर्मचारियों को किस श्रेणी में रखा गया था, उनका वेतन किस कंपनी से दिया जाता था और न्यूनतम मजदूरी का नियम उन पर लागू क्यों नहीं हुआ?
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