नई दिल्ली। जंतर-मंतर पर पिछले कुछ दिनों से चल रहे छात्र आंदोलनों में एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है – नेहा बोरा। ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा लगातार सुर्खियों में हैं।
उत्तराखंड से ताल्लुक
नेहा बोरा मूल रूप से उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर जिले के खटीमा की रहने वाली हैं। उनका परिवार एक फौजी परिवार है। उनके पिता भारतीय सेना में सेवा दे चुके हैं, इसलिए बचपन में उनकी पोस्टिंग के कारण वे अलग-अलग शहरों में रहीं। कई इंटरव्यू में नेहा खुद बता चुकी हैं कि उनका परिवार भाजपा समर्थक है, जबकि उनकी अपनी राजनीतिक सोच बिल्कुल अलग है। घर में इसको लेकर वैचारिक मतभेद भी रहे हैं।
पढ़ाई और थिएटर
शुरुआती पढ़ाई उन्होंने सिलीगुड़ी के दिल्ली पब्लिक स्कूल से की। इसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज से समाजशास्त्र में BA, फिर अंबेडकर यूनिवर्सिटी दिल्ली से MA किया। वर्तमान में वह JNU के स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड एस्थेटिक्स में थिएटर एंड परफॉर्मेंस स्टडीज में PhD कर रही हैं। वह एक प्रशिक्षित थिएटर आर्टिस्ट भी हैं।

राजनीतिक सफर
2018 के आसपास वह AISA से जुड़ीं। AISA भाकपा-माले (लिबरेशन) का छात्र संगठन है। फीस वृद्धि, स्कॉलरशिप और शिक्षा के मुद्दों पर आंदोलन करते हुए वह संगठन की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनीं। 2026 में NEET पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली में सुधार की मांग को लेकर सोनम वांगचुक के साथ जंतर-मंतर पर 23 दिन की भूख हड़ताल में वह चर्चा में आईं।
क्यों हैं चर्चा में
पिछले हफ्ते CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और वोटर लिस्ट में SIR की प्रक्रिया के विरोध में हुए प्रदर्शन के दौरान नेहा को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया था। AISA ने आरोप लगाया था कि उन्हें बिना नंबर प्लेट की निजी गाड़ी में बिना महिला पुलिसकर्मी के ले जाया गया। बाद में उन्हें नरेला इंडस्ट्रियल एरिया थाने से रिहा कर दिया गया। इसके बाद से वह लगातार केंद्र सरकार और चुनाव आयोग पर सवाल उठा रही हैं और 10 अक्टूबर को बड़े प्रदर्शन की अपील कर रही हैं।
पुलिस लाठीचार्ज, वाटर कैनन और भारी प्रशासनिक दबाव के बावजूद उन्होंने और उनके साथियों ने हार नहीं मानी। उनके द्वारा बोला गया यह वाक्य— “हमारी चोटें हिंसा की गवाही देंगी”। युवाओं के बीच काफी वायरल हुआ और आंदोलन का नारा बन गया।
अंततः मशहूर अभिनेत्री शबाना आज़मी और अन्य वरिष्ठ गणमान्य लोगों के समझाने तथा आंदोलन के एक पड़ाव पर पहुँचने के बाद उनका अनशन समाप्त हुआ।

सिलीगुड़ी की एक सामान्य छात्रा से लेकर दिल्ली यूनिवर्सिटी, आंबेडकर यूनिवर्सिटी और फिर JNU की शोधार्थी व एक राष्ट्रीय छात्र नेता बनने तक का नेहा बोरा का सफर आसान नहीं रहा है। अपने वैचारिक दृढ़ संकल्प, अटूट संघर्ष और दमन के आगे न झुकने की जिद के कारण आज वह देश के युवा वर्ग के एक बड़े हिस्से के लिए प्रेरणा और संघर्ष का प्रतीक बन चुकी हैं। हालांकि एक बड़ा वर्ग उनकी आलोचना भी करता है, जिस कारण आलोचकों ने उनके चेहरे पर स्याही तक फेंकी लेकिन नेहा बोरा ने अपनी वामपंथी विचारधारा से कभी समझौता नहीं किया।













