हल्द्वानी। कमर्शियल LPG के आसमान छूते दामों ने रेस्टोरेंट और ढाबा कारोबारियों की कमर तोड़ दी है। एक तरफ ग्राहक कम, दूसरी तरफ हर महीने सिलेंडर के बिल ने मुनाफे को लगभग खत्म कर दिया। ठीक इसी समय हल्द्वानी से एक ऐसा विकल्प सामने आया है जिसने पूरे कुमाऊं के किचनों की गणित ही बदल दी।
इस विकल्प का नाम है बायोमास पेलेट स्टोव। ये कोई देसी चूल्हा नहीं, बल्कि प्रोफेशनल कुकिंग के लिए तैयार आधुनिक मशीन है। ईंधन के तौर पर इसमें लकड़ी का बुरादा, पराली और मूंगफली के छिलकों से बने छोटे दाने जलते हैं। सुनने में अजीब लगे, लेकिन नतीजा चौंकाने वाला है।
इसे इस्तेमाल करने वाले कारोबारियों का दावा है कि उनकी ईंधन लागत 30 से 50 फीसदी तक गिर गई है। जो होटल रोज 2-3 कमर्शियल सिलेंडर फूंकते थे, वे अब हर महीने 40 हजार से 70 हजार रुपये तक बचा रहे हैं। यानी गैस का खर्च सीधा आधा।
करीब 2 साल पहले कृष्णा बिष्ट ने पर्यावरण को ध्यान में रखकर इस तकनीक को हल्द्वानी में उतारा था। तब लोगों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन जब LPG की किल्लत और महंगाई ने दस्तक दी तो यही पेलेट स्टोव संकट का सबसे बड़ा समाधान बन गया। आज छोटे होम-किचन से लेकर बड़े होटल और फैक्ट्री कैंटीन तक हर जगह इसकी डिमांड बढ़ गई है।
इस स्टोव की सबसे बड़ी खासियत है कम धुआं और तेज आंच। कचरे से बनने वाला ईंधन सस्ता भी है और पर्यावरण के लिए भी बेहतर। कारोबारी अब इसे सिर्फ एक मशीन नहीं, बल्कि अपने बिजनेस को बचाने वाला हथियार मान रहे हैं।





