नई दिल्ली। देर रात दिल्ली की सियासत में भूचाल आ गया। केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया। 2014 के बाद ये पहला मौका है जब किसी मंत्री को सड़क के दबाव में कुर्सी छोड़नी पड़ी। सवाल सबके मन में एक ही था – आखिर क्यों?
पिछले 10 दिनों से जवाब सड़कों पर गूंज रहा था। छात्र, युवा और विपक्ष एक ही मांग लेकर निकले थे। उनका आरोप था कि सरकार ने युवाओं को गुमराह किया, उन्हें भ्रम में रखा। जंतर-मंतर से संसद तक हर रोज नारे, प्रदर्शन और भूख हड़ताल। दबाव इतना बढ़ा कि सरकार के लिए संभालना मुश्किल हो गया।
इसी बीच 2 पेज की इस्तीफे की चिट्ठी सामने आई। 575 शब्दों में प्रधान ने दो बार साफ लिखा कि युवाओं को “भ्रमित” किया गया। मंत्री का खुद ये मान लेना सरकार के लिए सबसे बड़ा झटका बन गया।
इस पूरे आंदोलन को सबसे ज्यादा धार मिली कॉकरोच जनता पार्टी से। पार्टी प्रमुख अभिजीत दीपके दिन-रात जंतर-मंतर पर डटे रहे। इस्तीफे की खबर आते ही उन्होंने मंच से कहा, “ये घमंड करते थे कि यहां इस्तीफे नहीं होते। आज देख लो, झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए।” उनके इस एक बयान पर पूरा मैदान इंकलाब के नारों से भर गया।
राजधानी के सियासी गलियारों में इसे 12 साल का सबसे बड़ा झटका माना जा रहा है। 2018 में एमजे अकबर ने ‘मी टू’ के चलते इस्तीफा दिया था, लेकिन वो मामला अलग था। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा सीधा जनता के गुस्से और वोटर की नाराजगी से जुड़ा है।
इस्तीफे के बाद रात भर पीएम आवास में बैठकें चलीं। अंदर की बात है कि सरकार डरी हुई है। युवा वोट हाथ से निकल रहा है। इसलिए अब आनन-फानन में नए फैसलों पर मंथन शुरू हो गया है। विपक्ष इसे जनता की नैतिक जीत बता रहा है और इसे 2026 के चुनाव का मुद्दा बनाने की तैयारी में है।
उधर अभिजीत दीपके ने साफ कर दिया कि लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई। “ये सिर्फ शुरुआत थी। जब तक युवाओं को उनका हक नहीं मिलता, हम जंतर-मंतर नहीं छोड़ेंगे” कहकर उन्होंने आगे का रास्ता भी तय कर दिया।








