आय से अधिक संपत्ति के मामले में फंसे उत्तराखंड सरकार के पूर्व अपर सचिव समाज कल्याण रामविलास यादव को उत्तराखंड हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने उनकी याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है।
कोर्ट ने साफ कहा है कि एक ही आरोप पर दो समानांतर जांच एक साथ नहीं चल सकतीं। हालांकि कोर्ट ने याचिकाकर्ता को छूट दी है कि वह अन्य आदेशों को अलग-अलग रिट याचिका दायर कर चुनौती दे सकता है।
क्या है पूरा मामला?
रामविलास यादव उत्तराखंड में समाज कल्याण विभाग में अपर सचिव रह चुके हैं। इससे पहले वह यूपी में लखनऊ विकास प्राधिकरण में सचिव के पद पर तैनात थे। लखनऊ के एक व्यक्ति ने उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने की शिकायत की थी।
शिकायत के आधार पर उत्तराखंड सरकार ने विजिलेंस जांच शुरू कराई। विजिलेंस टीम ने लखनऊ, देहरादून और गाजीपुर स्थित उनके ठिकानों पर छापा मारा था। जांच में आरोप लगा कि यादव ने अपने और अपनी पत्नी के नाम पर आय से अधिक अकूत संपत्ति बनाई है। इसके बाद सरकार ने उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज कर दिया था।
बताया जाता है कि शासन ने 18 अक्टूबर 2021 को उनके खिलाफ आरोपों की जांच के लिए अपर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में बनी तीन सदस्यीय समिति को भंग कर दिया था। तर्क दिया गया था कि अब विजिलेंस जांच शुरू हो गई है।
इसी आदेश और 15 दिसंबर 2021 के आदेश को चुनौती देते हुए रामविलास यादव ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर मांग की थी कि समिति को बहाल किया जाए या फिर उच्च स्तर के अधिकारियों की नई समिति बनाई जाए।
29 अक्टूबर को सुनवाई के बाद खंडपीठ ने उनकी यह मांग ठुकरा दी और याचिका खारिज कर दी।











