देहरादून। उत्तराखंड में नगर निकायों में अफसरों की कमी के नाम पर शहरी विकास विभाग ने नियमों को ताक पर रख दिया है। प्रदेश की कई नगर पंचायतों और पालिकाओं में क्लर्क, कर निरीक्षक और सफाई निरीक्षकों को सीधे प्रभारी अधिशासी अधिकारी यानी ईओ का प्रभार सौंप दिया गया है। इस फैसले से योग्यता और पारदर्शिता को लेकर नए सिरे से सवाल उठ खड़े हुए हैं।
अधिशासी अधिकारी का पद राज्य में बेहद अहम माना जाता है। नियमानुसार इस पद पर नियुक्ति उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के जरिए होती है या फिर संबंधित संवर्ग में 7 से 8 साल की सेवा के बाद पदोन्नति से मिलती है। सफाई निरीक्षक संवर्ग के लिए तो पदोन्नति का कोई प्रावधान ही नहीं है। बावजूद इसके शहरी विकास निदेशालय ने महुआखेड़ागंज, लंढौरा, बाजपुर और पिरान कलियर समेत कई निकायों में निचले संवर्ग के कर्मचारियों को प्रभारी ईओ बना दिया है।
यह मामला पहले भी नैनीताल हाईकोर्ट पहुंच चुका है। 2 मई 2025 को कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि कर्मचारियों की कमी का हवाला देकर लिपिक संवर्ग को ईओ का प्रभार देना गलत है। कोर्ट ने सचिव शहरी विकास को चार महीने में ठोस निर्णय लेने और रिपोर्ट पेश करने के निर्देश भी दिए थे।
वर्तमान में पूरे प्रदेश में ईओ के सिर्फ 60 पद स्वीकृत हैं, जिनमें से आधे से ज्यादा नगर निगमों में तैनात हैं। ऐसे में खाली पड़े पदों को भरने के लिए विभाग ने अस्थायी व्यवस्था के तहत क्लर्क और कर कर्मियों को जिम्मेदारी दे दी है।
इस पर शहरी विकास मंत्री राम सिंह कैड़ा का कहना है कि ईओ के पद लंबे समय से रिक्त हैं और जनहित में यह व्यवस्था की गई है। वहीं कर्मचारी संगठन और विपक्ष इसे नियमों की अनदेखी बता रहे हैं और कह रहे हैं कि इससे निकायों के कामकाज की गुणवत्ता पर असर पड़ेगा।








