वरिष्ठ पत्रकार और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय (MCU) के पूर्व कुलपति जगदीश उपासने अपने परिवार के साथ हुए एक सार्वजनिक संपत्ति विवाद और सोशल मीडिया पर अपनी विचारधारा आधारित टिप्पणियों को लेकर चर्चा में है।
जगदीश उपासने संघ की विचारधारा के प्रतिनिधि पुरुष हैं। बीजेपी-आरएसएस की बौद्धिक सत्ता संरचना में पहली पंक्ति के जो दस-बीस नाम होंगे उनमें उपासने शामिल हैं।
इंडिया टुडे के हिंदी संस्करण की जिस जमाने में लाखों कॉपियां बिकती थीं, उपासने उसके संपादक हुआ करते थे। सरकार ने उन्हें माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय का कुलपति बनाया लेकिन पुरानी पत्रकार मंडली से पूछेंगे तो बहुत से लोग यही कहते मिलेंगे कि सरकार ने जिस तरह के नकारा लोगों को आगे बढ़ा रखा है, उसे देखते हुए श्री उपासने और ज्यादा बड़े इनाम-इकराम के हकदार थे।
अब इस आदमी का फेसबुक पेज देखिये। आपको कई बातें समझ में आएंगी। आपको ये समझ में आएगा कि चरित्र निर्माण के ज़रिये राष्ट्र निर्माण का दावा करने वाले आरएसएस का बौद्धिक और नैतिक स्तर क्या है। संघ यौन कुंठा में डूबे अहंकारी और हिंसक सवर्ण लोगों का संगठन है, जिसे बिना किसी दायित्व के सिर्फ सत्ता सुख चाहिए।
यह देश की सबसे बड़ी विभाजनकारी शक्ति है, जिसके पास देने के लिए घृणा के सिवा कुछ नहीं है। जब देश की सत्ता, सभ्य और सुसंस्कृत माने जाने वाले अटल बिहारी वाजपेयी जैसे राजनेता के हाथ में थी, तब यही लोग लंबे-लंबे पॉज लेकर कवियों की तरह शब्दों की जलेबी बनाते थे, जिनमें शुचिता, नैतिकता, संस्कृति और मर्यादा जैसे शब्द बिना किसी खास अर्थ के घूमा करते थे।
यह मोदी युग है। यहां सब कुछ एकदम खुल्ला है और तरक्की पाने का रास्ता वही है, जो कपिल मिश्रा और गौरव भाटिया ने सिखाया है। अपने आसपास देखिये, ना जाने कितने प्रकट और छिपे हुए संघी अचानक अपने पायजामे से बाहर आकर नफरत की धुन पर ताता-थैया करते मिलेंगे। वे इतना बड़ा जोखिम क्यों ले रहे हैं? उन्हें लगता है कि मौजूदा दौर में कुछ पाने का एकमात्र रास्ता यही है।
आखिर स्वीडन की इस युवा पत्रकार का कसूर क्या था? उसने नरेंद्र मोदी से सिर्फ एक वाक्य कहा था “प्रधानमंत्री जी आप दुनिया के सबसे आजाद मीडिया के सवालों के जवाब क्यों नहीं देना चाहते?“
इस हिमाकत के बदले सत्ता की कृपा के आंकाक्षी संघी टोले के बुजुर्ग अपनी बेटी नहीं बल्कि पोती के बराबर लड़की की निजी तस्वीर निकालकर उसकी चरित्र हत्या करने लगे। क्या वे सुश्री कंगना रणावत की तस्वीरों के साथ भी ऐसा कर सकते हैं? अपनी माँ, बहन और बेटी देवी, दूसरे की माँ वेश्या। संघी नैतिकता यहीं आकर पूर्णविराम को प्राप्त होती है।







