नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक सड़क हादसे में दाहिना पैर गंवाने वाले उत्तराखंड के लकड़हारे को मिलने वाले मुआवजे में बड़ा इजाफा कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि विकलांगता का आकलन सिर्फ मेडिकल रिपोर्ट से नहीं, बल्कि पीड़ित की रोजी-रोटी पर पड़े असर से होना चाहिए।
मामला 9 नवंबर 2004 का है। उत्तराखंड के लकड़हारे शंकर दत्त अपनी मोटरसाइकिल से जा रहे थे, तभी एक जीप ने उन्हें टक्कर मार दी। हादसे में वह गंभीर रूप से घायल हो गए और चोट की वजह से उनका दाहिना पैर घुटने के ऊपर से काटना पड़ा। इसके बाद वह लकड़ी काटने का अपना काम नहीं कर पाए।
उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने इस मामले में शंकर दत्त को 11.51 लाख रुपये का मुआवजा दिया था। शंकर दत्त ने इसे कम बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस एन.वी. अंजरिया की बेंच ने बुधवार को सुनवाई करते हुए मुआवजा बढ़ाकर 35.95 लाख रुपये कर दिया। कोर्ट ने कहा कि शंकर दत्त पेशे से लकड़हारा थे और पैर कटने के बाद वह अपना काम करने में पूरी तरह असमर्थ हो गए। इसलिए उनकी 100 फीसदी कार्यात्मक विकलांगता मानी जानी चाहिए।
बेंच ने टिप्पणी की कि अदालतों को पीड़ित की आजीविका पर चोट के वास्तविक प्रभाव को देखना चाहिए और कार्यात्मक विकलांगता को मान्यता देनी चाहिए, बजाय इसके कि सिर्फ मेडिकल सर्टिफिकेट पर निर्भर रहा जाए। कोर्ट ने कहा कि विकलांगता का आकलन उसके पेशे के संदर्भ में होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से हादसे में अंग गंवाने वाले लोगों को मुआवजा तय करने का नया आधार मिलेगा।








