देहरादून। उत्तराखंड सरकार की सांस्कृतिक नीति का असली चेहरा टिहरी के नरेंद्रनगर में उतर गया है। जिस राज्य में जागर सम्राट, ढोल-दमाऊं के थापी और थड्या-चौफला गाने वाले सैकड़ों लोक कलाकार 500 रुपये में भी मंच न मिलने से पलायन कर रहे हैं, उसी राज्य की सरकार ने पंजाबी पॉप सिंगर दलेर मेहंदी को एक रात होंठ हिलाने के लिए 35 लाख रुपये दे दिए। और ये 35 लाख भी मंत्री की जुबान से निकला है, कागज पर कितना और है, भगवान जाने।
खुद कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल ने कैमरे पर कबूला है कि दलेर मेहंदी को 35 लाख देकर कुंजापुरी मेले में बुलाया था। मंत्री का ही आरोप है कि इतना पैसा लेने के बाद भी कलाकार स्टेज पर खड़ा नहीं हो पा रहा था, नशे में धुत्त था और अपने ही गानों पर लिप-सिंक कर रहा था। सोचिए, जनता के टैक्स का 35 लाख किस पर लुटाया गया। नवरात्रि में मां दुर्गा के दरबार में, जहां शक्ति और भक्ति के गीत होने चाहिए थे, वहां सरकार ने एक ऐसे शो पर पैसा फेंका जिसे खुद उसका मंत्री बर्दाश्त नहीं कर पाया और बीच मंच पर जाकर फटकारना पड़ा।
ये सरकार की पहली लापरवाही नहीं है। सिद्धपीठ मां कुंजापुरी मेला टिहरी की लोक आस्था और पहाड़ी संस्कृति का प्रतीक है। यहां अगर उत्तराखंड के लोक गायकों को मौका मिलता तो जौनसार-बावर से लेकर कुमाऊं तक की संस्कृति दुनिया देखती। लेकिन सरकार को पहाड़ के कलाकारों में चमक नहीं दिखती। सरकार को दिखता है तो मुंबई, दिल्ली, पंजाब के बड़े नाम, जिनके पोस्टर पर फोटो लगाकर अफसर वाहवाही लूट सकें।
पद्मश्री प्रीतम भरतवाण जैसे लोक रत्न उसी मंच पर खड़े होकर कहते रहे कि लाइव में लिप-सिंक नहीं चलता, ये दर्शकों के साथ धोखा है। लेकिन सरकार को दर्शकों की नहीं, कमीशन और इवेंट कंपनी की फिक्र है।
और सबसे शर्मनाक बात, जब मीका सिंह ने कहा कि दलेर दो साल से बीमार हैं, सर्जरी हुई है, तब सवाल और बड़ा हो जाता है। क्या सरकार ने बिना मेडिकल फिटनेस जांचे, बिना ऑडिशन लिए, सिर्फ नाम देखकर 35 लाख का भुगतान कर दिया। ये लापरवाही नहीं तो क्या है। ये किसका पैसा था। ये वही पैसा है जिससे गांव के स्कूल में टाट-पट्टी नहीं है, अस्पताल में दवा नहीं है।
धामी सरकार को जवाब देना होगा कि एक रात के लिए 35 लाख लुटाने का हिसाब किसने पास किया। टेंडर कहां है। लोक कलाकारों के लिए कितना बजट रखा और बाहर के सिंगरों के लिए कितना। अगर मंत्री खुद मंच पर कह रहे हैं कि गाना ही नहीं गाया, तो 35 लाख की वसूली किससे होगी।
उत्तराखंड में लोक कलाकार खत्म होने की कगार पर हैं, क्योंकि सरकार ने उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया है। सरकार को तारा रा रा चाहिए, पहाड़ का थड्या-चौफला नहीं चाहिए।










