उत्तर प्रदेश में आरक्षण व्यवस्था के दुरुपयोग का एक बड़ा मामला राष्ट्रीय अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग की जांच में सामने आया है। आयोग की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के 12 जिलों में ब्राह्मण जाति के 4341 लोगों ने अनुसूचित जनजाति का फर्जी जाति प्रमाणपत्र बनवाकर सरकारी नौकरियां हासिल कर ली हैं।
आयोग ने अपनी जांच में पाया कि इन लोगों ने “ओझा” समुदाय का ST प्रमाणपत्र प्राप्त किया है। ओझा को घुमंतू जनजाति माना जाता है और यह समुदाय प्रदेश के 12 जिलों में पाया जाता है। चौंकाने वाली बात यह है कि 2001 की जनगणना के अनुसार बस्ती जिले में इस समुदाय की संख्या सिर्फ 100 थी, लेकिन उसी के नाम पर हजारों की संख्या में प्रमाणपत्र जारी कर दिए गए।
राष्ट्रीय SC/ST आयोग ने इस मामले की जांच के बाद उत्तर प्रदेश सरकार से लाभार्थियों की सूची और कार्रवाई रिपोर्ट मांगी थी। आयोग ने सरकार को निर्देश दिया था कि वह फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी कर रहे लोगों की सॉफ्ट और हार्ड कॉपी उपलब्ध कराए, लेकिन अब तक सरकार की ओर से रिपोर्ट नहीं भेजी गई है।
यह मामला बस्ती, महाराजगंज, सिद्धार्थनगर, गोरखपुर, देवरिया, मिर्जापुर, वाराणसी, बलिया और जौनपुर समेत कुल 12 जिलों से जुड़ा हुआ है। आयोग ने सरकार से मांग की है कि मामले की गहनता से जांच कर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए और फर्जी तरीके से लिए गए प्रमाणपत्रों को तत्काल निरस्त किया जाए।
अब बड़ा प्रश्न यह उठता है कि आखिर ब्राह्मण समाज अपनी जाति बदलने के लिए मजबूर क्यों हुआ है!








