सब हेडिंग – 2025 में सरकारी कर्मचारियों के परिजनों को लाभ की शिकायत पर हुई थी जांच, UERC ने भी तलब की पूरी फाइल
उत्तरकाशी। मुख्यमंत्री सौर स्वरोजगार योजना के तहत जिले के तीन विकासखंडों – मोरी, पुरोला और नौगांव में स्वीकृत 81 सौर परियोजनाओं की आवंटन प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो गए हैं। इन 81 में से 67 प्लांट स्थापित हो चुके हैं। सबसे ज्यादा मोरी में 30 में से 29, पुरोला में 5 में से 5 और नौगांव में 46 में से 33 प्लांट लग चुके हैं। तीनों ब्लॉकों की कुल स्थापित क्षमता 13.25 मेगावाट है।
2025 में हुई थी शिकायत, फिर क्या हुआ?
ये मामला 2025 में तब चर्चा में आया था जब शिकायत मिली थी कि योजना में सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों या उनके परिजनों को लाभ दिया जा रहा है और ‘पहले आओ, पहले पाओ’ नियम का पालन नहीं हो रहा। इस पर प्रमुख सचिव ऊर्जा ने सभी जिलाधिकारियों को पूर्व आवंटनों की जांच के आदेश दिए थे और नियम विरुद्ध पाए जाने पर सब्सिडी रोकने की बात कही थी।
लेकिन बड़ा सवाल यही है कि उत्तरकाशी में उस जांच का क्या हुआ? कितने मामलों की जांच हुई, क्या किसी अधिकारी के परिजन को लाभ मिला था और क्या कोई कार्रवाई हुई – इसका पूरा विवरण आज तक सार्वजनिक रिकॉर्ड में नहीं आया है।
नियम क्या कहता है
मार्च 2023 में संशोधित योजना के अनुसार यदि क्षमता से ज्यादा आवेदन आएं तो पूर्ण दस्तावेजों के साथ पोर्टल पर आवेदन की तारीख के आधार पर ‘पहले आओ, पहले पाओ’ के तहत आवंटन होना था। साथ ही एक परिवार से सिर्फ एक ही व्यक्ति को परियोजना देने का नियम है।
इसलिए सिर्फ लाभार्थी का नाम या उपनाम देखना काफी नहीं है। हर फाइल में आवेदन की तारीख, दस्तावेज पूरे होने की तारीख, TFR और Letter of Award की तारीख को एक साथ मिलाकर देखना होगा।
ब्लॉकवार आंकड़ा
मोरी – स्वीकृत 30, स्थापित 29, क्षमता 5,800 किलोवाट
पुरोला – स्वीकृत 5, स्थापित 5, क्षमता 850 किलोवाट
नौगांव – स्वीकृत 46, स्थापित 33, क्षमता 6,600 किलोवाट
कुल – 81 स्वीकृत, 67 स्थापित, 13,250 किलोवाट क्षमता
मोरी के कुकरेड़ा क्षेत्र में कई प्लांट एक ही जगह होना अपने आप में गड़बड़ी नहीं है, लेकिन फाइलों की जांच जरूरी है।
अब UERC ने मांगी फाइल
इस मामले में नया मोड़ 2026 में आया है। उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग (UERC) ने UREDA से MSSY की 200 किलोवाट वाली परियोजनाओं की आवंटन से लेकर कमीशनिंग तक की पूरी कालानुक्रमिक रिपोर्ट और प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग फाइलें तलब की हैं। आयोग के सामने ऐसे मामले भी आए हैं जहां 2024 में आवेदन और 2026 में LoA जारी हुआ। इससे देरी पर भी सवाल उठ रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल
किसी सरकारी कर्मचारी के रिश्तेदार का लाभार्थी होना ही भ्रष्टाचार नहीं है। असली जांच यह है कि क्या संबंधित कर्मचारी की खुद आवंटन, तकनीकी जांच, कनेक्शन या सब्सिडी देने में कोई भूमिका थी? अगर भूमिका और रिश्तेदारी दोनों मिलती है, तभी हितों का टकराव माना जाएगा।
फिलहाल दस्तावेज यह साबित नहीं करते कि मोरी-पुरोला-नौगांव में किसी को नियम विरुद्ध लाभ मिला, लेकिन 2025 की शिकायतों और अब UERC द्वारा फाइलें मांगे जाने के बाद इन 81 परियोजनाओं का पारदर्शी दस्तावेजी ऑडिट ही दूध का दूध पानी का पानी कर सकता है।










