देहरादून। उत्तराखंड परिवहन निगम की बे टिकट (बिना किराए की सवारी) रोकने की कवायद उस वक्त सवालों में आ गई जब एक ही बस की दो बार जांच में बिल्कुल अलग नतीजे सामने आए। ऋषिकेश डिपो की बस संख्या UK07-PA-4525 को लेकर हुआ यह पूरा घटनाक्रम निगम के प्रवर्तन तंत्र की कार्यशैली पर उंगली उठा रहा है।
सोमवार सुबह यह बस दिल्ली से देहरादून होते हुए ऋषिकेश के लिए निकली थी। लच्छीवाला टोल प्लाजा के पास पर्वतीय, ग्रामीण और देहरादून डिपो के तीन एटीआई की संयुक्त टीम ने बस को रोका। यहीं से विवाद शुरू हुआ। आरोप लगा कि टीम ने परिचालक से मिलीभगत कर पैसे लेकर बस को आगे जाने दिया।
इसके बाद बस जब जौलीग्रांट एयरपोर्ट के पास पहुंची तो मंडल कार्यालय का विशेष प्रवर्तन दल पहले से मुस्तैद था। टीआई आनंद पाल और संजीव कुमार ने बस की दोबारा जांच की तो उसमें ऋषिकेश जाने वाले दो यात्री बिना टिकट मिले। इसके बाद दल ने परिचालक जितेंद्र कुमार के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर दी। बस में चालक विमल कुमार भी तैनात थे।
मामला यहीं नहीं रुका। परिचालक ने पलटवार करते हुए पहले जांच करने वाले दल पर ही बस छोड़ने की एवज में रिश्वत लेने का आरोप जड़ दिया। इसके बाद पूरा मामला निगम मुख्यालय तक पहुंचा और उच्चाधिकारियों ने जांच के आदेश दे दिए हैं।
एक तरफ निगम दावा करता है कि बे टिकट यात्रा पर पूरी तरह लगाम कसी जा रही है, दूसरी तरफ एक ही बस में कुछ किलोमीटर के फासले पर दो अलग-अलग रिपोर्ट सामने आ गईं। इस घटना ने साफ कर दिया कि निगरानी के नाम पर चल रही व्यवस्था में कितनी खामियां हैं और प्रवर्तन दल खुद कितने कटघरे में हैं।









