उत्तराखंड राज्य सहकारी बैंक लिमिटेड की अल्मोड़ा शाखा में सामने आया करोड़ों का ऋण घोटाला सहकारी बैंकिंग व्यवस्था की अंदरूनी कमजोरियों को सामने लाता है। यह मामला 2017 का है जब बैंक की प्रबंधन समिति ने एक फर्म को कैश क्रेडिट सुविधा के तहत 2 करोड़ रुपये की ऋण सीमा के नवीनीकरण को मंजूरी दी थी। आरोप है कि तत्कालीन प्रबंध निदेशक, महाप्रबंधक, सहायक महाप्रबंधक और शाखा प्रबंधक ने समिति के इस निर्णय को दरकिनार कर खुद ही ऋण सीमा बढ़ाकर 7 करोड़ रुपये कर दी।
शिकायत में कहा गया है कि सीमा बढ़ाने से पहले न तो फर्म की वित्तीय स्थिति का सही आकलन किया गया और न ही पर्याप्त गारंटी और प्रतिभूति ली गई। बैंक के नियमों के अनुसार किसी भी ऋण सीमा में बदलाव के लिए प्रबंधन समिति की मंजूरी जरूरी होती है, लेकिन यहां नियमों की खुली अनदेखी कर फर्म के दो निदेशकों को अतिरिक्त 5 करोड़ रुपये का लाभ पहुंचाया गया। फाइल में जरूरी दस्तावेजों की कमी और प्रक्रिया में जल्दबाजी भी जांच का हिस्सा है।
मामले का खुलासा नए प्रबंधन द्वारा पुराने खातों की समीक्षा के दौरान हुआ। विसंगतियां मिलने पर आंतरिक जांच कराई गई और फिर बैंक प्रबंधन ने कोतवाली अल्मोड़ा में तहरीर दी। पुलिस ने धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश की धाराओं में तत्कालीन एमडी, जीएम, एजीएम, शाखा प्रबंधक और फर्म के दो निदेशकों सहित 6 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। अब पुलिस यह पता लगा रही है कि बढ़ाई गई राशि का उपयोग कहां हुआ और इस पूरी प्रक्रिया में और कौन-कौन शामिल था।
इस घोटाले का असर सीधे आम जमाकर्ताओं पर पड़ता है। सहकारी बैंक ग्रामीण क्षेत्रों, किसानों और छोटे व्यापारियों के लिए सस्ते ऋण का मुख्य जरिया हैं। जब बड़े स्तर पर अनियमित ऋण वितरण होता है तो बैंक का एनपीए बढ़ता है, रिकवरी प्रभावित होती है और इसका दबाव नई ऋण योजनाओं और ब्याज दरों पर पड़ता है। साथ ही जमाकर्ताओं का भरोसा भी कमजोर होता है। बैंक अधिकारियों का कहना है कि दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी और अन्य शाखाओं के बड़े ऋण खातों की भी समीक्षा की जाएगी। यह प्रकरण साफ करता है कि सार्वजनिक पैसे से चलने वाले संस्थानों में पारदर्शिता और निगरानी कितनी जरूरी है।








