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पैसा सा बहुत कुछ है लेकिन सब कुछ नहीं : सलमान खान भी बीमारी से जूझ रहे, अलका याज्ञनिक भी

June 26, 2026
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पैसा सा बहुत कुछ है लेकिन सब कुछ नहीं : सलमान खान भी बीमारी से जूझ रहे, अलका याज्ञनिक भी
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जिंदगी कभी-कभी ऐसे दृश्य दिखाती है जो ग्लैमर की चमक के पीछे छिपा सबसे बड़ा सच सामने रख देते हैं। एक तरफ करोड़ों दिलों की धड़कन सलमान ख़ान हैं, दूसरी तरफ अपनी आवाज़ से पीढ़ियों को सुर देने वाली अलका याज्ञनिक। एक के पास अपार शोहरत, दूसरे के पास अनगिनत सम्मान। लेकिन दोनों एक ऐसी सच्चाई के सामने खड़े हैं जिसके आगे न पैसा काम आता है, न प्रसिद्धि, न ताकत।

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23 जून का वो दृश्य बहुतों की आँखें नम कर गया। जब अलका याज्ञनिक पद्म सम्मान ग्रहण करने के लिए व्हीलचेयर पर मंच तक पहुँचीं, पूरा सभागार तालियों से गूंज रहा था। विडंबना ये कि तालियाँ उन्हीं के लिए थीं, पर वो उन्हें सुन नहीं पा रही थीं।

जिस आवाज़ ने दशकों तक करोड़ों को रुलाया और हँसाया, वही स्वर आज दो वर्षों से दुर्लभ बीमारी सेंसरीन्यूरल नर्व हियरिंग लॉस से जूझ रहा है। ये कान की अंदरूनी नस से जुड़ी गंभीर बीमारी है जिसमें सुनने की क्षमता अचानक या धीरे-धीरे खत्म हो सकती है। शुरुआती 24 घंटे में इलाज न मिले तो वापसी की उम्मीद बहुत कम रह जाती है। अगर किसी को अचानक सुनाई देना बंद हो जाए या कान में लगातार घंटी जैसी आवाज़ आए, तो तुरंत ईएनटी विशेषज्ञ से मिलना चाहिए। इस बीमारी में समय ही सबसे बड़ी दवा है।

उधर सलमान ख़ान वर्षों से तीन बेहद गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारियों से लड़ रहे हैं। ट्राइजेमिनल न्यूराल्जिया, ब्रेन एन्यूरिज्म और आर्टेरियोवेनस मैलफॉर्मेशन यानी AVM।

ट्राइजेमिनल न्यूराल्जिया को मेडिकल साइंस सबसे असहनीय दर्द देने वाली बीमारियों में गिनती है। चेहरे पर बिजली के झटके जैसा दर्द उठता है। बोलना, खाना, दाँत साफ करना जैसी साधारण बातें भी यातना बन जाती हैं।

ब्रेन एन्यूरिज्म में दिमाग की रक्तवाहिका कमजोर होकर फूल जाती है और फटने पर जानलेवा रक्तस्राव का खतरा रहता है।

AVM दिमाग की रक्तवाहिकाओं की जन्मजात विकृति है जो सिरदर्द, दौरे और ब्रेन हेमरेज जैसी गंभीर स्थिति पैदा कर सकती है।

इन सबके बावजूद सलमान लगातार काम कर रहे हैं। अलका मुस्कुराकर सम्मान स्वीकार कर रही हैं।

यहीं से जिंदगी का सबसे बड़ा सवाल उठता है। अगर इतने सफल, प्रसिद्ध और संपन्न लोग भी दुख से मुक्त नहीं हैं, तो इंसान आखिर किस चीज़ के पीछे भाग रहा है?

यही सवाल ढाई हजार साल पहले राजकुमार सिद्धार्थ के मन में भी उठा था। रोग, बुढ़ापा, मृत्यु देखकर उन्होंने समझा कि संसार का हर सुख अस्थायी है। उसी खोज ने उन्हें गौतम बुद्ध बना दिया।

बुद्ध ने अपने पहले उपदेश में कहा कि जीवन का पहला सत्य है दुःख। इसका मतलब ये नहीं कि जीवन सिर्फ पीड़ा है, बल्कि ये कि जो कुछ भी बदलने वाला है, उससे चिपकाव अंततः दुख देता है। शरीर बदलेगा, स्वास्थ्य बदलेगा, रिश्ते बदलेंगे, प्रसिद्धि बदलेगी, आवाज़ बदल सकती है, चेहरा बदल सकता है।

दूसरा सत्य है दुःख का कारण तृष्णा और आसक्ति। तीसरा सत्य है दुःख का अंत संभव है। और चौथा सत्य है उस अंत का मार्ग।

इसी मार्ग का एक व्यावहारिक अभ्यास है विपश्यना। विपश्यना का अर्थ है चीजों को जैसा वे वास्तव में हैं, वैसा देखना।

जब साधक शांत बैठकर बिना प्रतिक्रिया दिए अपनी साँसों और शरीर में उठती संवेदनाओं का साक्षी बनता है, तब उसे अनुभव होता है कि हर अनुभूति आती है और चली जाती है। दर्द भी स्थायी नहीं, सुख भी स्थायी नहीं। शरीर बदल रहा है, मन बदल रहा है, भावनाएँ बदल रही हैं।

यहीं से स्वीकार का जन्म होता है। और स्वीकार से संघर्ष कम होता है। संघर्ष कम होता है तो मानसिक पीड़ा भी कम होने लगती है।

इसका अर्थ ये नहीं कि विपश्यना कैंसर, बहरेपन या न्यूरोलॉजिकल रोगों को खत्म कर देती है। चिकित्सा का स्थान चिकित्सा ही ले सकती है। लेकिन मन को दुख के साथ जीने की क्षमता देना, भय और घबराहट को कम करना, वर्तमान क्षण में टिकना, यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है।

शायद इसलिए बुद्ध ने कहा था कि बाहरी परिस्थितियों पर हमारा अधिकार सीमित है, लेकिन उनके प्रति हमारी प्रतिक्रिया पर हमारा अधिकार हो सकता है।

आज अलका याज्ञनिक और सलमान ख़ान की खबरें सिर्फ फिल्मी खबरें नहीं हैं। वे जीवन का आईना हैं।

वे याद दिलाती हैं कि धन, यश, पुरस्कार और लोकप्रियता महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन वे मनुष्य को रोग, पीड़ा और मृत्यु से मुक्त नहीं कर सकते।

इसलिए शायद जीवन का सबसे बड़ा निवेश बैंक बैलेंस नहीं, बल्कि मन की स्थिरता है। और शायद सबसे बड़ी उपलब्धि प्रसिद्ध होना नहीं, बल्कि दुख के बीच भी भीतर से शांत रहना है।

कुछ देर रुककर सोचिए। हम जिस बात के लिए आज इतना परेशान हैं, क्या वह भी कुछ वर्षों बाद उतनी ही बड़ी लगेगी? या फिर जीवन हमें भी किसी दिन यही सिखाएगा कि दुख से भागना नहीं, उसे समझना ही मुक्ति की शुरुआत है।

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