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बड़ी खबर : राज्य का महिला प्रौद्योगिकी संस्थान नहीं उतरा मानकों के अनुरूप खरा……

August 19, 2023
in एक्सक्लूसिव, खुलासा
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बड़ी खबर : राज्य का महिला प्रौद्योगिकी संस्थान नहीं उतरा मानकों के अनुरूप खरा……
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प्रदेश का वीर माधो सिंह भंडारी उत्तराखंड टेक्निकल  यूनिवर्सिटी कैंपस में वर्ष 2012 में उत्तराखंड की बेटियों हेतु राज्य का एकमात्र सरकारी महिला इंजीनियरिंग कॉलेज प्रारंभ किया गया था। जो नेताओं और अधिकारियों की महत्वाकांक्षाओं का प्रारंभ से ही भेंट चढ़ता रहा है। 

महिला प्रौद्योगिकी संस्थान उत्तराखंड की बेटियों की प्रयोगशाला बन गया है। जिसका अहसास समय समय पर विभिन्न समाचार पत्रों के माध्यम से संस्थान में पढ़ने वाली बेटियों के माता पिता और अभिभावकों को होता रहा है, जिससे उनका विश्वास समय समय पर टूटता रहा है।

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वर्तमान में पुनः इतिहास दोहराने को तैयार है, विगत वर्षो में अपनी बेटियों को राज्य का एक मात्र महिला कॉलेज मान कर जिन माता पिता ने एडमिशन दिलवाया था वो विश्विद्यालय के कुलसचिव के ०५-०८-२०२३ के पत्र संख्या १६८६ के बाद से हतप्रभ है। छात्रों द्वारा भी संस्थान के सत्र २०२३-२४ के प्रथम दिवस हुई आप बीती से चकित है कि उन्होंने महिला कॉलेज में एडमिशन लिया था किन्तु पुरुष स्टूडेंट्स भी संस्थान में ऊपर से निचे तक भ्रमण कर रहे है। जिस पर संस्थान प्रशासन भी मौन है। हो भी क्यों ना, वो विश्विद्यालय के दबाव में है।

एक अलग पहाड़ी राज्य की लड़ाई लड़ने वाले आंदोलनकारियों के सपनो का उत्तराखंड ये कभी नहीं था,जिसमे उनकी बेटियों के लिए ही अब कोई स्थान नहीं बचा। दुर्भाग्य ये भी है कि जहा केंद्र सरकार के साथ साथ राज्य सरकार भी बेटी पढ़ाओ बेटी बचाव के नारे सिर्फ कागजो तक ही सीमित रखना चाहती हो, उस राज्य कि बेटियों के लिए और क्या अपेक्षा कि जा सकती है। सायद सभी मौन है सत्ता और ताकत के दबाओ में, ना ही छेत्रीय  विधायक जी ने कभी संज्ञान लिया, ना ही तकनीकी शिक्षा मंत्री जी ने, ना ही तकनीकी सचिव महोदय ने, ना ही राज्य के युवा, ऊर्जावान मुख्यामंत्री जी ने। ले भी क्यों, कोई व्यक्तिगत स्वार्थ तो है नहीं, आज समाचार पत्रों में आएगा फिर इलेक्शन आते आते  सब भूल जायेंगे।

 

सोचना होगा, क्या महिला प्रौद्योगिकी संस्थान का निर्माण विश्विद्यालय के कुलपति महोदय के सपने को पूरा करने को भेट चढ़ना होगा। विश्वविद्यालय परिसर में जब एक महिला इंजीनियरिंग कॉलेज था तो उसी परिसर में १०० मीटर के अंदर एक और इंजीनियरिंग कॉलेज को बिना तैयारी के प्रारम्भ करने का निर्णय क्या उचित था ?

उत्तराखंड में वर्ष २०११ के बाद से खुले इंजीनियरिंग कॉलेज पर नजर डाली जाये तो, सभी कॉलेज में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स के साथ साथ वह पढ़ाने वाले टीचर्स के भी बुरे हालत है। जिसकी न ही शासन को फिक्र है और ना ही प्रशासन को। विश्वविद्यालय कैंपस में बिना तैयारी के फिर से खोले गए इंजीनियरिंग कॉलेज यही दर्शाता है कि सिर्फ और सिर्फ किसी अधिकारी को सुविधा देने के लिए ये कदम है ना कि स्टूडेंट्स के लिए।

 

यदि स्टूडेंट्स के उज्वल भविष्य के लिए विश्विद्यालय प्रशासन की सोच होती तो सायद महिला प्रौद्योगिकी संस्थान की गरीब बेटियों के लिए विश्विद्यालय प्रशासन हॉस्टल का निर्माण करवाता, फैकल्टी ऑफ़ टेक्नोलॉजी बी. टेक प्रारंभ ना कर के उसमे चलने वाले ऍम.टेक कोर्स में नियमित टीचर्स की नियुक्ति करवाता किन्तु सत्य बिलकुल विपरीत है। शायद शासन या प्रशासन में कोई भी उत्तराखंडियत सोच रखता तो आज उत्तराखंड के इंजीनियरिंग कॉलेज की दशा कुछ और ही होती। 

सवाल वही खड़ा है, इसके बाद भी उत्तराखंड की बेटियों का होगा क्या ?

Tags: Corruption news in Hindidaily corruption news in Hindilatest corruption news in Hindiupdated corruption news in Hindi
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सरकार बहादुर पार्ट 3 : उत्तराखंड की बेटा सायरा सरकार की नितियों से परेशान, सोशल मीडिया पर हो रहा वीडियो वायरल  देहरादून। उत्तराखंड की बेटी सायर ने नेशनल ताइक्वांडो चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतकर पूरे राज्य का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। देहरादून के CNI Girls School की कक्षा 12 की छात्रा सायरा ने अपनी मेहनत से इंटरनेशनल स्पर्धा के लिए भी क्वालीफाई किया। लेकिन सरकार की गलत नीतियों और उदासीनता की वजह से उसका सपना अधूरा रह गया।  10 अगस्त 2026 को देहरादून में हुए ‘मुख्यमंत्री युवा विद्यार्थी मंथन’ कार्यक्रम में जब सायरा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सामने पहुंची तो उसकी आंखें भर आईं। उसने बताया कि इंटरनेशनल टूर्नामेंट में जाने के लिए डेढ़ लाख रुपये चाहिए थे। घर की हालत ऐसी नहीं थी कि इतनी रकम जुटा पाती। नतीजा ये हुआ कि देश के लिए खेलने का मौका हाथ से चला गया।  यही है सरकार की “खेल नीति” की सच्चाई। एक तरफ ढोल पीटा जाता है “खेलो इंडिया” का, दूसरी तरफ गोल्ड मेडलिस्ट खिलाड़ी को बुनियादी मदद के लिए भी तरसना पड़ता है। सायरा के जिले में आज तक एक भी सरकारी ताइक्वांडो सेंटर नहीं बना। प्रैक्टिस के लिए हर महीने 8000 रुपये प्राइवेट हॉल को देने पड़ते हैं। बरसात में सरकारी स्टेडियम बंद रहते हैं या वीआईपी के नाम बुक रहते हैं। नेशनल के बाद मिलने वाला यात्रा भत्ता और प्रोत्साहन राशि आज भी फाइलों में अटकी है।  सायरा के माता-पिता ने कर्ज लेकर बेटी को नेशनल तक पहुंचाया। उन्हें उम्मीद थी सरकार सहयोग करेगी। लेकिन जब मदद मांगी तो जवाब मिला बजट नहीं है। वहीं जीत के बाद अफसर और नेता फोटो खिंचवाकर “बेटी बचाओ” का भाषण दे देते हैं।  सायरा का सवाल सरकार से सीधा है। अगर एक नेशनल गोल्ड मेडलिस्ट को डेढ़ लाख की कमी के कारण पीछे बैठना पड़े तो आम खिलाड़ी क्या करेगा? खिलाड़ियों और अभिभावकों की मांग है कि तुरंत हर जिले में फ्री कोचिंग, समय पर किट और भत्ता, और इंटरनेशनल जाने वाले खिलाड़ियों के लिए फंड की व्यवस्था हो।  साफ है सरकार को मेडल से मतलब है, खिलाड़ी से नहीं। जब तक नीतियां कागजों तक सीमित रहेंगी, सायरा जैसी बेटियां गोल्ड जीतकर भी अपने सपने बेचने को मजबूर रहेंगी। सायरा एक एनसीसी कैडेट भी है, सरकार खिलाड़ियों को आगे बढ़ाने के खोखले दावे करती है, इन दावों में कितना दम है यह धरातल पर पता चल रहा है।

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