देशभर में पूर्व विधायकों को मिल रही मोटी पेंशन को लेकर इन दिनों बड़ी बहस छिड़ गई है। जानकारी के अनुसार कई कार्यकाल रह चुके पूर्व विधायक आज भी हर महीने एक लाख से लेकर एक लाख सात हजार रुपये तक पेंशन ले रहे हैं। एक बार विधायक बनने के बाद आजीवन पेंशन देने की व्यवस्था पर अब जनता के बीच सवाल खड़े होने लगे हैं।
संबंधित राज्य के कानून के तहत पूर्व विधायक को एक कार्यकाल पूरा करने के बाद ही पेंशन का हक मिल जाता है। कई राज्यों में एक से अधिक कार्यकाल वाले पूर्व विधायकों की पेंशन एक लाख रुपये से अधिक हो जाती है, जिसमें मूल पेंशन के साथ कई तरह के भत्ते और अन्य सुविधाएं भी शामिल होती हैं।
इसको लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि जहाँ एक सरकारी कर्मचारी को पेंशन के लिए 30 से 35 साल तक सेवा करनी पड़ती है, वहीं जनप्रतिनिधि एक कार्यकाल में ही पेंशन के हकदार बन जाते हैं। सरकारी कर्मचारियों की पेंशन व्यवस्था पर लगातार समीक्षा और बदलाव होते रहते हैं, लेकिन पूर्व विधायकों की पेंशन लगातार बढ़ती जा रही है। इससे आम लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या जनप्रतिनिधि का पद सेवा का है या लाभ का जरिया बन गया है।
पूर्व विधायक और सरकारी कर्मचारी की सेवा शर्तों में काफी अंतर है। सरकारी कर्मचारियों के लिए एनपीएस, ओपीएस और यूपीएस जैसे नियम लागू हैं, जबकि पूर्व विधायकों को पुरानी व्यवस्था के तहत सीधे पेंशन का लाभ मिलता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरी पेंशन व्यवस्था की समीक्षा होनी चाहिए। एक तरफ सरकारें ओपीएस बहाली को लेकर आर्थिक बोझ का हवाला देती हैं, तो दूसरी तरफ पूर्व जनप्रतिनिधियों को लाखों रुपये की पेंशन दी जा रही है, जिससे समाज में असमानता का संदेश जा रहा है।






