देहरादून। उत्तराखंड के 26 वर्षों के राजनीतिक इतिहास में घोषणाएं करने की होड़ हमेशा से रही है, तब चाहे बीजेपी की सरकार रही हो या कांग्रेस की। दोनों ही सरकारों के ‘थोकदारों’ ने विकास के पथ पर कोरी घोषणाओं की खूब दौड़ लगाई। ऐसे में 5 साल से अधिक राज करने वाले मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने घोषणाओं का नया कीर्तिमान हासिल किया है।
यदि आंकड़ों पर गौर करें तो यह साफ हो जाता है कि राज्य के लगभग सभी मुख्यमंत्रियों ने जनता से बड़े-बड़े वादे तो किए, पर उन्हें धरातल पर उतारने में बड़े पैमाने पर नाकामी हाथ लगी। इस फेहरिस्त में वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी घोषणाएं करने के मामले में सबसे आगे जरूर हैं, लेकिन उनके कार्यकाल में लंबित और अधूरी योजनाओं का अंबार भी सबसे बड़ा है।
सभी मुख्यमंत्रियों की घोषणाओं और उनके क्रियान्वयन का कच्चा-चिट्ठा दी गई आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के अब तक के सभी मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल का लेखा-जोखा इस प्रकार है।
पुष्कर सिंह धामी (वर्तमान मुख्यमंत्री)- धाकड़ धामी ने अपने कार्यकाल में अब तक की सर्वाधिक 4,620 घोषणाएं की हैं। इनमें से 2,852 पूरी हुई हैं, जबकि 1,397 घोषणाएं अभी भी अंतिम चरण में अटकी हुई हैं, अब कुछ ही दिनों बाद विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लगने वाली है, लेकिन अधूरी घोषणाओं का पहाड़ अभी भी धुरंधर धामी के कंधों पर खड़ा है। यह घोषणाएं प्रशासनिक सुस्ती और केवल हवा में वादे करने की प्रवृत्ति पर बड़ा सवालिया निशान लगाती हैं।
हरीश रावत-इन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान 3,814 घोषणाएं की थीं, जिनमें से 2,201 ही पूरी हो पाईं और भारी-भरकम 1,613 घोषणाएं शेष (अधूरी) रह गईं।
त्रिवेंद्र सिंह रावत-इनके कार्यकाल में कुल 2,406 घोषणाएं की गईं, जिसमें से 2,063 पूरी हुईं और 343 घोषणाएं अधूरी रह गईं।
विजय बहुगुणा-इन्होंने 1,348 घोषणाएं की थीं, जिनमें से आधी से ज्यादा यानी 680 घोषणाएं ही पूरी हो सकीं और 668 शेष रह गईं, जो इनकी कार्यप्रणाली की नाकामी को दर्शाती हैं।
रमेश पोखरियाल ‘निशंक’-इनके कार्यकाल में 1,140 घोषणाएं की गईं, लेकिन इनमें से महज 450 घोषणाएं ही पूरी हो पाईं, जबकि 690 घोषणाएं अधूरी पड़ी रहीं, जो कि बेहद खराब क्रियान्वयन दर को दिखाता है।
एन. डी. तिवारी- राज्य के शुरुआती दौर में एन. डी. तिवारी ने 895 घोषणाएं की थीं, जिनमें से केवल 311 पूरी हुईं और अधिकांश यानी 584 घोषणाएं अधूरी रह गईं।
बी. सी. खंडूरी (पहला कार्यकाल)- अपने पहले कार्यकाल के दौरान इन्होंने 584 घोषणाएं की थीं, जिनमें से 303 पूरी हुईं और 281 अधूरी रह गईं। हालांकि, उनके दूसरे कार्यकाल में केवल 33 घोषणाएं की गईं और वे सभी पूरी कर ली गईं।
तीरथ सिंह रावत- अपने बेहद संक्षिप्त कार्यकाल में इन्होंने 183 घोषणाएं कीं, जिनमें से मात्र 90 पूरी हो पाईं और 93 घोषणाएं अधूरी रह गईं।
जनता के साथ सिर्फ आंकड़ों का खिलवाड़
इन तमाम आंकड़ों से यह साफ जाहिर होता है कि उत्तराखंड के पिछले 26 सालों में सत्ता में बैठे लगभग हर मुख्यमंत्री ने जनता को बड़े-बड़े सपनों और घोषणाओं के जाल में उलझाए रखा। वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सबसे ज्यादा 4,620 घोषणाएं करके रिकॉर्ड तो जरूर बनाया है, लेकिन 1,300 से अधिक घोषणाओं का अब भी अंतिम चरण में लटके रहना यह साबित करता है कि ज़मीनी स्तर पर जनता को सिर्फ आश्वासनों के सिवाय कुछ नहीं मिला है।











