देहरादून। रोजाना छपने वाला दैनिक अखबार ‘राष्ट्रीय सहारा’ अब बंदी की कगार पर चल रहा है। वर्ष 1991 में पहली बार प्रकाशित होने वाला यह अखबार अब बंद होने वाला है। अब यह संस्थान वित्तीय संकट जूझ रहा है। जिस कारण अखबार अपने रिपोर्टर, ब्यूरो चीफ सहित अन्य कर्मचारियों को वेतन भुगतान नहीं कर पा रहा है। इसके चलते सभी स्टाफ हड़ताल पर है।
अखबार के हजारों पाठकों को घर पर अखबार ना मिलने के कारण उनमें संशय बना हुआ है कि आखिर अखबार क्यों नहीं आ रहा!
रिपोर्ट्स के अनुसार, राष्ट्रीय सहारा अखबार के सभी संस्करणों (दिल्ली सहित) का प्रकाशन लगभग 8 जनवरी, 2026 को बंद हो गया है, क्योंकि सहारा मीडिया के वेंचर के रूप में यह अगले आदेश तक ठप कर दिया गया है, जिससे राष्ट्रीय सहारा अखबार के सभी संस्करणों का प्रकाशन अगले आदेश तक ठप कर दिया गया है। राष्ट्रीय सहारा अखबार कुल सात यूनिटों से प्रकाशित होता था। इसमें नई दिल्ली, लखनऊ, कानपुर, वाराणसी, गोरखपुर और पटना यूनिट से यूपी, बिहार, झारखंड, उत्तराखंड, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, भोपाल, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के कुल करीब 56 संस्करण प्रकाशित होते थे।
इसमें दिल्ली यूनिट से करीब 4 माह से प्रकाशन बंद था और अन्य यूनिटों में प्रकाशन जारी था। लेकिन अब राष्ट्रीय सहारा के सभी यूनिटों के यूनिट हेड और प्रबंधकों ने अपने अपने यूनिट के मीडिया कर्मियों को बताया कि मीडिया हेड सुमित राय का मौखिक निर्देश आया कि सभी यूनिटों में अखबार का प्रकाशन नहीं होगा।
मीडिया हेड सुमित राय को जयब्रत राय की तरफ से लगातार निर्देश दिया जा रहा था कि कर्मचारियों की छंटनी करें और अखबार का प्रकाशन तत्काल बंद करायें। संभवत: इसी आधार पर सभी संस्करणों का प्रकाशन अगले आदेश तक बंद किया जा रहा है।
रिपोर्टर और कर्मचारियों का भविष्य अधर में
इस फैसले से कर्मचारियों को वेतन, ग्रेच्युटी और अन्य बकायों को लेकर चिंता है। उन्हें महीनों से वेतन भुगतान नहीं हुआ है, इसके साथ ही रिटायर कर्मचारी का पीएफ और अन्य फंड तक संस्थान की ओर से भुगतान नहीं किया गया है। ऐसे में लगातार राष्ट्रीय सहारा अखबार अपनी छवि खराब कर रहा है। अकेले उत्तराखंड में 800 से अधिक रिपोर्टर और अन्य कर्मचारी इस संस्थान में कार्यरत हैं। अब यह हड़ताल पर हैं। ऐसे में पत्रकारों और कर्मचारियों का भविष्य अधर में लटक गया है।










