भारतीय सिनेमा के सबसे बेबाक और दमदार अभिनेताओं में से एक नाना पाटेकर अब हमारे बीच नहीं रहे। आज सुबह गोवा के डोना पाउला स्थित अपने घर में जबरदस्त कार्डियक अरेस्ट से उनका निधन हो गया। वे 75 साल के थे। उनके बेटे मल्हार पाटेकर ने इस दुखद खबर की पुष्टि की है।
सिनेमा से सेना तक
नाना पाटेकर को लोग पर्दे पर एक सख्त और बेबाक एक्टर के तौर पर जानते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्होंने असल जिंदगी में भी सेना की वर्दी पहनी थी और कारगिल की लड़ाई में हिस्सा लिया था।
कहानी शुरू होती है 1990 में। फिल्म प्रहार की शूटिंग के लिए नाना पाटेकर ने मराठा लाइट इन्फेंट्री के साथ तीन साल तक असली फौजियों जैसी कड़ी ट्रेनिंग ली थी। सुबह उठना, दौड़ना, हथियार चलाना, सब कुछ। यही ट्रेनिंग उनके दिल में देश सेवा का जज्बा भर गई।

फिर आया 1999 का कारगिल युद्ध। देश पर संकट आया तो नाना से रहा नहीं गया। उन्होंने ठान लिया कि उन्हें भी सीमा पर जाना है। उन्होंने सेना के बड़े अधिकारियों से संपर्क किया, लेकिन सभी ने मना कर दिया। एक फिल्म एक्टर को युद्ध के मैदान में कैसे भेजा जा सकता है?
नाना हार मानने वालों में से नहीं थे। उन्होंने सीधे तब के रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस को फोन लगाया। जॉर्ज साहब ने भी पहले तो इसे असंभव बताया। तब नाना ने उनसे कहा कि सेना में कैप्टन बनने के लिए छह महीने की ट्रेनिंग होती है, जबकि मैंने तीन साल तक मराठा रेजिमेंट के साथ ट्रेनिंग ली है।
उनके इस जुनून को देखकर रक्षा मंत्रालय को झुकना पड़ा। अगस्त 1999 में नाना पाटेकर को भारतीय सेना में मानद कैप्टन के पद पर शामिल कर लिया गया। इस दौरान उन्होंने अपनी सभी फिल्मों की शूटिंग रोक दी थी।
कैप्टन नाना पाटेकर को द्रास, कुपवाड़ा, बारामुला, सोपोर और मुगलपुरा जैसे सबसे खतरनाक इलाकों में तैनात किया गया। वे सिर्फ नाम के कैप्टन नहीं थे। उन्होंने जवानों के साथ बॉर्डर पर पेट्रोलिंग की, बंकरों में रहे और एलओसी पर मिलिट्री हॉस्पिटल में घायल जवानों की देखभाल भी की।











