उत्तराखंड के दुर्गम और अति-दुर्गम स्कूलों में सालों से पढ़ा रहे 2018 भर्ती के अतिथि शिक्षक आज खुद गहरे संकट से गुजर रहे हैं। पहाड़ के बच्चों को शिक्षा की रोशनी दिखा रहे इन शिक्षकों की जिंदगी आर्थिक तंगी और भविष्य की अनिश्चितता में उलझ गई है।
नाम न छापने की शर्त पर अतिथि शिक्षकों का आरोप है कि वर्तमान शिक्षा मंत्री सरकार के महत्वपूर्ण विभाग संभाल रहे हैं लेकिन अपने अधीनस्थ शिक्षा विभाग के प्रति लापरवाह हैं, ट्रांसफर के खेल में शिक्षा मंत्री व्यस्त हैं लेकिन अतिथि शिक्षकों की मांगों को नहीं माना जा रहा है।
सितंबर 2022 के बाद गेस्ट टीचरों के 25 हजार रुपये के मानदेय में एक रुपया भी नहीं बढ़ा है और सेवा सुरक्षा को लेकर आज तक कोई ठोस नीति नहीं बन पाई है। उल्टा पहले मिलने वाला 12 महीने का मानदेय भी अब घटकर करीब 10 महीने 11 दिन का रह गया है। ग्रीष्मकालीन और शीतकालीन अवकाश का वेतन काटा जा रहा है, जिससे घर चलाना मुश्किल हो गया है।
महंगाई के इस दौर में घर-परिवार से दूर रहकर पढ़ा रहे इन शिक्षकों पर बच्चों की फीस, माता-पिता के इलाज और रोजमर्रा के खर्च का भारी दबाव है। नियमित भर्तियां, ट्रांसफर और प्रमोशन की हर नई प्रक्रिया के साथ इनके रोजगार पर संकट मंडराने लगता है।
सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिन कंधों पर पहाड़ के हजारों बच्चों का भविष्य टिका है, उनका अपना भविष्य ही अधर में लटका है। विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, ऐसे में सवाल है कि क्या सरकार वर्षों से संघर्ष कर रहे इन अतिथि शिक्षकों के लिए सम्मानजनक वेतन और सेवा सुरक्षा का ठोस समाधान निकालेगी या फिर ये एक बार फिर केवल आश्वासनों में ही उलझे रह जाएंगे।









