हरिद्वार। जहाँ एक ओर लोग गंगनहर की उफनती लहरों को देखकर सहम जाते हैं, वहीं महमूदपुर कलियर निवासी शारिक सिद्दीकी इसी मौत के सैलाब से अब तक 500 से अधिक लोगों को सुरक्षित बाहर निकाल चुके हैं। हाल ही में लक्सर निवासी सैफ की जान बचाने के बाद एक बार फिर शारिक की जांबाजी चर्चा में है, लेकिन अफसोस इस बात का है कि इतने वर्षों की निस्वार्थ सेवा के बावजूद प्रशासन ने आज तक इस ‘रियल लाइफ हीरो’ को सम्मानित करना मुनासिब नहीं समझा।
नहर किनारे प्रसाद की दुकान चलाने वाले शारिक सिद्दीकी के लिए यह केवल एक साहस का कार्य नहीं, बल्कि उनके माता-पिता द्वारा दिया गया संस्कार है। शारिक बताते हैं, “मेरे माता-पिता ने मुझे हमेशा एक ही सीख दी है कि नहर में डूबते हुए हर व्यक्ति की जान बचाना मेरा पहला फर्ज है। दुकानदारी बाद में है, इंसानियत पहले है।” इसी प्रेरणा के चलते जब भी नहर किनारे ‘बचाओ-बचाओ’ की पुकार सुनाई देती है, शारिक बिना अपनी जान की परवाह किए पानी में छलांग लगा देते हैं।
अब तक सैकड़ों लोगों को बचा चुका है शारिक की दुकान के पास ही अक्सर हादसे होते हैं और वह हर बार देवदूत बनकर सामने आते हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक जिस युवक ने बिना किसी सरकारी मदद या वेतन के 500 लोगों के घर के चिराग बुझने से बचाए, उसे किसी भी जिला स्तरीय या प्रशासनिक मंच पर सम्मान नहीं मिला।
क्षेत्रीय जनता का कहना है कि प्रशासन को ऐसे जांबाज युवाओं का मनोबल बढ़ाना चाहिए ताकि समाज में सेवा का यह जज्बा जिंदा रहे। शारिक आज उन सभी के लिए एक मिसाल हैं जो बिना किसी स्वार्थ के मानवता की सेवा में जुटे हैं। उम्मीद है कि शासन-प्रशासन जल्द शरिक को सम्मान देगा।








