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चिंताजनक : बजट के अभाव में ड्यूटी से हटाए गए 2900 पीआरडी जवान

February 8, 2026
in एक्सक्लूसिव
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चिंताजनक : बजट के अभाव में ड्यूटी से हटाए गए 2900 पीआरडी जवान
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देहरादून। प्रदेश में यातायात व्यवस्था संभाल रहे 2900 पीआरडी स्वयंसेवकों की डयूटी के लिए विभाग के पास बजट नहीं है। जिसे देखते हुए इस महीने से इनकी सेवाएं समाप्त कर दी गई हैं। निदेशालय युवा कल्याण एवं प्रांतीय रक्षक दल के निर्देश पर जिला युवा कल्याण एवं प्रांतीय रक्षक दल अधिकारियों की ओर से यह निर्देश जारी किया गया है। विभाग के निदेशक आशीष चौहान के मुताबिक चारधाम यात्रा के दौरान इन्हें लगाया गया, इसके बाद भी जरूरत के हिसाब से कुछ स्वयंसेवकों की डयूटी लगाई गई।

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प्रदेश में दस हजार से ज्यादा पीआरडी स्वयं सेवकों में से 7514 डयूटी पर हैं। जिनसे पुलिस थाना और चौकियों में ड्यूटी के साथ ही सचिवालय, विधानसभा, आबकारी विभाग, आरटीओर, मंडी समिति, समाज कल्याण, जल संस्थान, शिक्षा और तकनीकी शिक्षा सहित विभिन्न विभागों में डयूटी ली जा रही है। इसमें 908 महिलाएं और 6608 पुरुष हैं। विभाग के अधिकारियों के मुताबिक इनमें से 2900 पीआरडी स्वयं सेवकों की मई 2024 में चारधाम यात्रा के लिए विभिन्न जिलों में डयूटी लगाई गई थी। इसके लिए 32 करोड़ का बजट मंजूर हुआ था, लेकिन बजट की समाप्ति के बाद इनकी डयूटी समाप्त कर दी गई है। हालांकि इनमें से कुछ स्वयं सेवकों से फिर से काम लिया जाएगा। निदेशालयसे इसके लिए बजट जारी हुआ है।

प्रांतीय रक्षक दल हित संगठन के प्रदेश संयोजक प्रमोद मंद्रवाल ने मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में कहा, प्रदेश में पीआरडी जवान सरकारी और अर्द्धसरकारी विभागों में शांति सुरक्षा डयूटी, कंप्यूटर ऑपरेटर, वाहन चालक, अनुसेवक, रात्रि चौकीदार, माली, कुक आदि के रूप में सेवाएं दे रहे हैं। उपनल कर्मचारियों और होमगार्ड को जहां समान काम के लिए समान वेतनमान दिया जा रहा है। वहीं दूसरी और पीआरडी जवानों की अनदेखी की जा रही है।

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सरकार बहादुर पार्ट 3 : उत्तराखंड की बेटा सायरा सरकार की नितियों से परेशान, सोशल मीडिया पर हो रहा वीडियो वायरल  देहरादून। उत्तराखंड की बेटी सायर ने नेशनल ताइक्वांडो चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतकर पूरे राज्य का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। देहरादून के CNI Girls School की कक्षा 12 की छात्रा सायरा ने अपनी मेहनत से इंटरनेशनल स्पर्धा के लिए भी क्वालीफाई किया। लेकिन सरकार की गलत नीतियों और उदासीनता की वजह से उसका सपना अधूरा रह गया।  10 अगस्त 2026 को देहरादून में हुए ‘मुख्यमंत्री युवा विद्यार्थी मंथन’ कार्यक्रम में जब सायरा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सामने पहुंची तो उसकी आंखें भर आईं। उसने बताया कि इंटरनेशनल टूर्नामेंट में जाने के लिए डेढ़ लाख रुपये चाहिए थे। घर की हालत ऐसी नहीं थी कि इतनी रकम जुटा पाती। नतीजा ये हुआ कि देश के लिए खेलने का मौका हाथ से चला गया।  यही है सरकार की “खेल नीति” की सच्चाई। एक तरफ ढोल पीटा जाता है “खेलो इंडिया” का, दूसरी तरफ गोल्ड मेडलिस्ट खिलाड़ी को बुनियादी मदद के लिए भी तरसना पड़ता है। सायरा के जिले में आज तक एक भी सरकारी ताइक्वांडो सेंटर नहीं बना। प्रैक्टिस के लिए हर महीने 8000 रुपये प्राइवेट हॉल को देने पड़ते हैं। बरसात में सरकारी स्टेडियम बंद रहते हैं या वीआईपी के नाम बुक रहते हैं। नेशनल के बाद मिलने वाला यात्रा भत्ता और प्रोत्साहन राशि आज भी फाइलों में अटकी है।  सायरा के माता-पिता ने कर्ज लेकर बेटी को नेशनल तक पहुंचाया। उन्हें उम्मीद थी सरकार सहयोग करेगी। लेकिन जब मदद मांगी तो जवाब मिला बजट नहीं है। वहीं जीत के बाद अफसर और नेता फोटो खिंचवाकर “बेटी बचाओ” का भाषण दे देते हैं।  सायरा का सवाल सरकार से सीधा है। अगर एक नेशनल गोल्ड मेडलिस्ट को डेढ़ लाख की कमी के कारण पीछे बैठना पड़े तो आम खिलाड़ी क्या करेगा? खिलाड़ियों और अभिभावकों की मांग है कि तुरंत हर जिले में फ्री कोचिंग, समय पर किट और भत्ता, और इंटरनेशनल जाने वाले खिलाड़ियों के लिए फंड की व्यवस्था हो।  साफ है सरकार को मेडल से मतलब है, खिलाड़ी से नहीं। जब तक नीतियां कागजों तक सीमित रहेंगी, सायरा जैसी बेटियां गोल्ड जीतकर भी अपने सपने बेचने को मजबूर रहेंगी। सायरा एक एनसीसी कैडेट भी है, सरकार खिलाड़ियों को आगे बढ़ाने के खोखले दावे करती है, इन दावों में कितना दम है यह धरातल पर पता चल रहा है।

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